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Delhi सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि मौत की सज़ा को कम करने के हमारे उदार रवैये की वजह से देश में अपराध बढ़ रहे हैं और इस पर "कहीं न कहीं रोक लगनी चाहिए"। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने हरियाणा के हत्या के दोषी संजीव कुमार की समय से पहले रिहाई की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा, "हमारे उदार रवैये की वजह से ही भारत को इन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। माफ़ करना, माफ़ करना, माफ़ करना - कहीं न कहीं तो आपको एक सीमा तय करनी ही होगी।" इससे पहले, उसकी मौत की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया गया था।
दोषी की याचिका पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रखते हुए, बेंच ने उस मामले का ज़िक्र किया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अपनी ही बेटी के साथ रेप और हत्या करने वाले एक व्यक्ति की मौत की सज़ा को कम कर दिया था।
बेंच ने कहा, "इस कोर्ट (SC) ने एक ऐसे मामले में मौत की सज़ा को कम किया था जिसमें एक पिता ने अपनी बड़ी बेटी के साथ रेप और हत्या की थी। (वह) माँ की गवाही के आधार पर उम्रकैद की सज़ा काटता है। कुछ सालों बाद, पिता पैरोल पर बाहर आता है और अपनी छोटी बेटी के सामने माँ की हत्या कर देता है। छोटी बेटी की गवाही पर उसे मौत की सज़ा सुनाई जाती है। और फिर सुप्रीम कोर्ट मौत की सज़ा को उम्रकैद में बदल देता है, इस आधार पर कि उसने छोटी बच्ची की हत्या नहीं की थी। यह वही सुप्रीम कोर्ट है (जिसने सज़ा कम करने का आदेश दिया था)। इसीलिए हम कहते हैं कि हमारे उदार रवैये पर कहीं न कहीं रोक लगनी चाहिए।"
जस्टिस दत्ता ने कहा कि पहले हत्या के मामलों में सज़ा 'रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर' (सबसे दुर्लभ मामलों) के सिद्धांत पर आधारित होती थी, लेकिन अब समय बदल गया है। उन्होंने सवाल किया, "पहले के दिनों में, हत्या के मामले में मौत की सज़ा 'रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर' मामलों के आधार पर दी जाती थी, क्योंकि हत्याएं कम होती थीं। क्या अब भी ऐसा ही है?" कई हत्याओं का दोषी पाए जाने के बाद, कुमार को 2004 में मौत की सज़ा सुनाई गई थी। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने 2005 में उसकी सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2007 में उसकी मौत की सज़ा को फिर से बहाल कर दिया। गवर्नर और राष्ट्रपति द्वारा उसकी दया याचिकाएँ खारिज किए जाने के बाद, कुमार ने फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। कोर्ट ने 2014 में उसकी दया याचिका पर फ़ैसला लेने में हुई बहुत ज़्यादा देरी का हवाला देते हुए उसकी मौत की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया। अब, वह हरियाणा सरकार की 2002 की रेमिशन पॉलिसी (सज़ा में छूट की नीति) के तहत जेल से समय से पहले रिहाई की मांग कर रहा है, क्योंकि उसने अपनी सज़ा के 20 साल पूरे कर लिए हैं।
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