पंजाब

Punjab में कृषि बदलाव, पराली प्रबंधन मशीनों का तेजी से उपयोग

Ratna Netam
16 April 2026 1:33 PM IST
Punjab में कृषि बदलाव, पराली प्रबंधन मशीनों का तेजी से उपयोग
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Punjab.पंजाब: धान की कटाई के बाद पंजाब में फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों के उपयोग में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। राज्य के कई जिलों में किसान अब पराली जलाने के बजाय आधुनिक मशीनों की मदद से फसल अवशेषों का निपटान कर रहे हैं। इस बदलाव को कृषि और पर्यावरण दोनों के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों से पराली जलाने की समस्या को लेकर पंजाब लगातार चर्चा में रहा है। इससे न केवल वायु प्रदूषण बढ़ता है, बल्कि आसपास के राज्यों में भी इसका असर देखने को मिलता है। ऐसे में सरकार और कृषि विभाग द्वारा किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों के उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
इन मशीनों में सुपर सीडर, हैप्पी सीडर, स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम और बेलर जैसी तकनीकें शामिल हैं, जिनकी मदद से खेतों में बचे अवशेषों को जलाने की जरूरत नहीं पड़ती। किसान इन मशीनों का उपयोग कर खेत को अगली फसल के लिए तैयार कर रहे हैं।
कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इस वर्ष मशीनों के उपयोग में पहले की तुलना में बढ़ोतरी देखी गई है। सरकारी सब्सिडी और जागरूकता अभियानों के कारण किसानों में इसके प्रति रुचि बढ़ी है।
पंजाब सरकार ने भी पराली प्रबंधन को लेकर कई योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें किसानों को मशीनें उपलब्ध कराना और किराए पर मशीन केंद्र स्थापित करना शामिल है। इससे छोटे और सीमांत किसानों को भी तकनीक का लाभ मिल रहा है।
किसानों का कहना है कि मशीनों के उपयोग से न केवल पर्यावरण की रक्षा हो रही है, बल्कि खेतों की उर्वरता भी बनी रहती है। हालांकि, कुछ किसानों का यह भी मानना है कि मशीनों की उपलब्धता और लागत अभी भी कुछ क्षेत्रों में चुनौती बनी हुई है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह प्रवृत्ति इसी तरह जारी रहती है, तो आने वाले वर्षों में पराली जलाने की घटनाओं में काफी कमी आ सकती है। इससे वायु गुणवत्ता में सुधार होने की संभावना भी बढ़ेगी।
स्थानीय प्रशासन भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। गांव-गांव में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं ताकि अधिक से अधिक किसान मशीनों का उपयोग करें और पराली जलाने से बचें।
कुल मिलाकर, पंजाब में फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों का बढ़ता उपयोग कृषि क्षेत्र में एक सकारात्मक बदलाव का संकेत है, जो पर्यावरण संरक्षण और आधुनिक खेती दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो रहा है।
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