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Punjab.पंजाब: पंजाब में स्थित Nangal Dam और उससे जुड़ी नांगल झील इन दिनों बढ़ते सिल्ट (गाद) संकट का सामना कर रही है। हालिया आकलनों के अनुसार झील की जल भंडारण क्षमता में लगभग 24 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है, जो जल संसाधन प्रबंधन के लिए गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्षों से जमा हो रही गाद ने झील की गहराई को कम कर दिया है, जिससे पानी संग्रहित करने की क्षमता प्रभावित हुई है। यह समस्या नई नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में इसमें तेजी आई है। पहाड़ी क्षेत्रों से आने वाली मिट्टी और बारिश के दौरान बहकर आने वाला मलबा झील में जमा होता जा रहा है, जिससे सिल्ट की परत लगातार मोटी होती जा रही है। इस स्थिति का सीधा असर सिंचाई और बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है।
नांगल डैम क्षेत्र भाखड़ा प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बड़े हिस्से को पानी और बिजली उपलब्ध कराता है। अगर झील की क्षमता इसी तरह घटती रही, तो आने वाले समय में पानी की आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। स्थानीय किसानों ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि पानी की उपलब्धता कम हुई, तो फसलों पर असर पड़ेगा और कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। पहले से ही मौसम की अनिश्चितताओं का सामना कर रहे किसानों के लिए यह एक अतिरिक्त चुनौती बन सकती है। विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों का सुझाव है कि इस समस्या से निपटने के लिए नियमित रूप से डीसिल्टिंग (गाद हटाने) का काम किया जाना चाहिए। इसके अलावा, कैचमेंट एरिया में मिट्टी कटाव को रोकने के लिए भी ठोस कदम उठाने की जरूरत है। पेड़-पौधों की कमी और अनियंत्रित निर्माण गतिविधियां भी इस समस्या को बढ़ा रही हैं।
सरकारी स्तर पर भी इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि झील की क्षमता को बहाल करने और सिल्ट को कम करने के लिए योजनाएं तैयार की जा रही हैं। आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर गाद हटाने और जल संरक्षण को बेहतर बनाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि केवल डीसिल्टिंग ही पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी। इसमें जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण, वनीकरण और टिकाऊ विकास नीतियों को शामिल करना जरूरी है, ताकि भविष्य में इस तरह की समस्याओं को रोका जा सके। कुल मिलाकर, नांगल झील में बढ़ता सिल्ट संकट न केवल जल भंडारण की क्षमता को प्रभावित कर रहा है, बल्कि कृषि, ऊर्जा और पर्यावरण पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। समय रहते प्रभावी कदम उठाए गए, तो इस महत्वपूर्ण जल स्रोत को बचाया जा सकता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।
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