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Punjab.पंजाब: पंजाब में गेहूं खरीद प्रक्रिया में हो रही देरी को लेकर किसान यूनियनों ने सरकार के खिलाफ नाराजगी जताई है और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है। किसानों का कहना है कि मंडियों में फसल पहुंचने के बावजूद खरीद व्यवस्था सुचारु रूप से नहीं चल रही है, जिससे उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
किसान संगठनों के अनुसार, कई मंडियों में अभी तक खरीद एजेंसियां पूरी तरह सक्रिय नहीं हुई हैं, जिसके कारण किसानों को अपनी फसल बेचने में देरी हो रही है। इस देरी से न केवल उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है, बल्कि फसल की गुणवत्ता पर भी असर पड़ने का खतरा बढ़ गया है।
किसान नेताओं ने आरोप लगाया है कि प्रशासन की तैयारियों में कमी के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है। उनका कहना है कि सरकार हर साल खरीद प्रक्रिया को लेकर बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अलग ही दिखाई देती है।
यूनियनों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही खरीद प्रक्रिया को तेज नहीं किया गया और सभी मंडियों में पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई, तो वे राज्यव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे। इसमें धरना-प्रदर्शन और मंडियों का घेराव भी शामिल हो सकता है।
Punjab Government की ओर से हालांकि दावा किया गया है कि गेहूं खरीद को लेकर सभी आवश्यक प्रबंध किए जा चुके हैं और किसानों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं आने दी जाएगी। अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती दिनों में थोड़ी देरी होती है, लेकिन जल्द ही प्रक्रिया सामान्य हो जाएगी।
मंडी अधिकारियों ने भी बताया कि खरीद एजेंसियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे तेजी से काम करें और किसानों की फसल को प्राथमिकता के आधार पर खरीदा जाए। इसके साथ ही तौल, भुगतान और उठान प्रक्रिया को भी तेज करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
किसानों का कहना है कि यदि समय पर फसल की खरीद नहीं होती तो उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। कई किसानों ने यह भी बताया कि बारिश और मौसम की अनिश्चितता के कारण पहले ही उनकी फसल पर असर पड़ा है, और अब खरीद में देरी उनकी समस्याओं को और बढ़ा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि व्यवस्था में समयबद्ध खरीद प्रक्रिया बेहद जरूरी है, ताकि किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य समय पर मिल सके और वे अगली फसल की तैयारी कर सकें।
फिलहाल, किसान यूनियनों की चेतावनी के बाद स्थिति पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और अधिक गंभीर रूप ले सकता है यदि प्रशासन और किसान संगठनों के बीच समाधान नहीं निकलता है।
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