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Punjab पंजाब के मुख्यमंत्री कार्यालय में 'ऑफ़िसर ऑन स्पेशल ड्यूटी' (OSD) राजबीर सिंह घुमन ने अपने ख़िलाफ़ दर्ज FIR में CBI की जांच को रद्द करने की मांग की थी। इसके एक दिन बाद, शुक्रवार को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के जस्टिस जसजीत सिंह बेदी ने निर्देश दिया कि इस मामले को चीफ़ जस्टिस के सामने रखा जाए। जस्टिस बेदी ने कहा कि चीफ़ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की डिवीज़न बेंच ने 5 अक्टूबर को FIR दर्ज करने का निर्देश दिया था। बेंच जांच की निगरानी भी कर रही थी। इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई थी।
जस्टिस बेदी ने कहा, "इसलिए, उचित यही है कि यह कोर्ट इस मामले पर फ़ैसला न करे, क्योंकि एक डिवीज़न बेंच ने FIR दर्ज करने का आदेश दिया था और वह आदेश सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के तहत है और उस पर फ़ैसला होना बाकी है। इसे देखते हुए, इस मामले को उचित आदेश के लिए चीफ़ जस्टिस के सामने रखा जाए।" अपनी याचिका में, घुमन ने यह भी मांग की थी कि जब तक एक्ट के प्रावधानों के तहत ज़रूरी मंज़ूरी न मिल जाए, तब तक सभी संबंधित कार्रवाइयों को रोक दिया जाए। उन्होंने तर्क दिया कि CBI ने एक्ट की धारा 17A के तहत ज़रूरी मंज़ूरी के बिना 6 अक्टूबर को संगरूर में उनके घर पर गैर-कानूनी रूप से तलाशी ली थी।
उन्होंने आगे कहा, "CBI ने 5 अक्टूबर को रात 11.50 बजे FIR दर्ज करने के बाद और कानून के तहत ज़रूरी मंज़ूरी लिए बिना तलाशी ली और कानून की स्थापित स्थिति के विपरीत कार्रवाई की।" कानून का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि संसद ने एक ऐसा प्रावधान बनाया है जिसमें "सिर्फ़ एक अपवाद की गुंजाइश है"। इसमें कहा गया है कि कोई भी पुलिस अधिकारी किसी सरकारी कर्मचारी के ख़िलाफ़ एक्ट के तहत किसी अपराध की पूछताछ या जांच सरकार की पूर्व मंज़ूरी के बिना नहीं करेगा (जैसा कि धारा 17A में ज़रूरी है), "जब अपराध उसके आधिकारिक कार्यों के दौरान की गई किसी सिफ़ारिश या लिए गए फ़ैसले से संबंधित हो"।
उन्होंने आगे कहा: "5 अक्टूबर को FIR दर्ज होने के चौबीस घंटे के भीतर, प्रतिवादी CBI ने तलाशी वारंट हासिल किया और याचिकाकर्ता या उनके परिवार के किसी भी सदस्य की अनुपस्थिति में उनके परिसर की तलाशी ली।" उन्होंने की गई कार्रवाई और सामान ज़ब्त करने पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि ये सब कानून का उल्लंघन करके किया गया। उन्होंने कहा, "पंजाब सरकार को धारा 17A के तहत कोई प्रस्ताव नहीं भेजा गया। इसके लिए कोई मंज़ूरी नहीं ली गई। इनमें से हर कदम एक तरह की जांच है, जिसे करने से कानून ने CBI को मना किया है।"
उनके वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ शुरू की गई कोई भी कार्रवाई कानून के मुताबिक होनी चाहिए और CBI को कानूनी दायरे में रहकर काम करना चाहिए, साथ ही एक्ट की धारा 17A के तहत दिए गए सुरक्षा उपायों का पालन करना चाहिए। वकील ने आगे कहा, "एक्ट की धारा 17A सुरक्षा देती है और इसका सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। CBI कानून के आदेश को नज़रअंदाज़ करके अपनी मर्ज़ी से मामले में आगे नहीं बढ़ सकती।"
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