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Punjab.पंजाब: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (NCERT) ने हाल ही में फिजिकल एजुकेशन की नई पाठ्यपुस्तक जारी की है, जिसमें भारतीय पारंपरिक खेलों को शामिल किया गया है। इस किताब में विशेष रूप से गतका और मल्लखंब का जिक्र किया गया है। यह कदम पारंपरिक खेलों और भारत की सांस्कृतिक विरासत को छात्रों के बीच बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
गतका, जो मुख्यतः पंजाब और उत्तर भारत में प्रचलित है, एक प्राचीन मार्शल आर्ट है। इसे आत्मरक्षा, संतुलन और शारीरिक फिटनेस के लिए अपनाया जाता है। वहीं, मल्लखंब भारतीय खेल और योग का अनूठा मिश्रण है, जिसमें खिलाड़ी लकड़ी या लोहे के खंभे पर संतुलन बनाए रखते हुए जटिल मुद्राएं करते हैं। NCERT के अनुसार, इन खेलों को पाठ्यक्रम में शामिल करने का उद्देश्य छात्रों को न केवल शारीरिक रूप से फिट रखना है, बल्कि उन्हें भारतीय परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ना भी है।
पुस्तक के लेखकों ने बताया कि गतका और मल्लखंब जैसी पारंपरिक गतिविधियों को पढ़ाने से छात्रों में संतुलन, फोकस, ताकत और मानसिक अनुशासन विकसित होता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक खेलों के साथ-साथ पारंपरिक खेलों को भी सीखने से बच्चों में राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक आत्मसम्मान का भाव पैदा होता है।
शिक्षा विशेषज्ञों ने इस कदम की सराहना की है। उनका कहना है कि भारतीय खेलों को पाठ्यक्रम में शामिल करने से युवा पीढ़ी में इन खेलों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी। साथ ही यह पहल उन खेलों को पुनर्जीवित करने का अवसर भी प्रदान करती है, जो समय के साथ कम प्रचलित हो गए हैं।
कई स्कूलों ने नई किताब को लेकर उत्साह व्यक्त किया है। शिक्षक और खेल प्रशिक्षक मानते हैं कि गतका और मल्लखंब को पाठ्यक्रम में शामिल करने से बच्चों में साहस, संतुलन, लचीलापन और शारीरिक शक्ति विकसित होगी। इसके अलावा, यह पहल छात्रों में समूह गतिविधियों और सामाजिक कौशल को बढ़ावा देती है।
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने कहा है कि इस किताब का उद्देश्य केवल शारीरिक शिक्षा तक सीमित नहीं है। यह छात्रों को भारत की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक खेल और योग से जोड़ने का प्रयास है। मंत्रालय का कहना है कि भविष्य में और भी पारंपरिक खेलों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा।
इस नई पाठ्यपुस्तक से यह संदेश भी मिलता है कि शिक्षा सिर्फ अकादमिक ज्ञान तक सीमित नहीं है। बच्चों को शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक अनुशासन और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ना भी शिक्षा का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए।
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