पंजाब

ड्रग्स केस में कैसे फंसे राजजीत सिंह

Kiran
24 Sept 2026 11:33 AM IST
ड्रग्स केस में कैसे फंसे राजजीत सिंह
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Chandigarh रज्जीत सिंह हुंदल पंजाब पुलिस सर्विस के एक बर्खास्त अधिकारी हैं। 2019 में ड्रग तस्करी और जबरन वसूली रैकेट से कथित संबंधों के कारण नौकरी से निकाले जाने से पहले वे AIG (असिस्टेंट इंस्पेक्टर जनरल) के पद तक पहुँचे थे। यह मामला सालों तक पंजाब में पुलिस और ड्रग माफिया के गठजोड़ की जाँच के केंद्र में रहा।
राजनीतिक महत्व
पंजाब पुलिस द्वारा यह गिरफ्तारी ऐसे समय में हुई है जब राजनीतिक माहौल गर्म है और 2027 में पंजाब विधानसभा चुनाव होने हैं। सिंह का सालों तक फरार रहने का सिलसिला पटियाला पुलिस के सामने उनके सरेंडर के साथ खत्म हुआ। इसकी पुष्टि मौजूदा DGP गौरव यादव ने 'द ट्रिब्यून' से की। इससे पंजाब के ड्रग-व्यापार की जाँच से जुड़े सबसे लंबे समय से चल रहे भगोड़े मामलों में से एक का समापन हुआ।
निश्चित रूप से, पंजाब पुलिस इस गिरफ्तारी को अपनी एक बड़ी उपलब्धि बता सकती है। इससे सत्ताधारी भगवंत मान सरकार को राज्य की गरमा-गरम राजनीति में एक महत्वपूर्ण शुरुआती जीत का दावा करने का मौका मिलता है, जहाँ BJP, कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल जैसी सभी प्रमुख विपक्षी पार्टियाँ पंजाब को "नशे के आदी लोगों के गढ़" के ठप्पे से बचाने का वादा कर रही हैं।
'पुलिस-ड्रग गठजोड़' और राजनीति
भगवंत मान के नेतृत्व वाली सत्ताधारी AAP सरकार ने अपने ड्रग-विरोधी अभियान को अपनी उपलब्धियों का मुख्य आधार बनाया है। वे अक्सर गिरफ्तारी, जब्ती और इस व्यापार में कथित रूप से शामिल अधिकारियों की बर्खास्तगी के आँकड़े पेश करते हैं, ताकि यह साबित किया जा सके कि वे 2022 के चुनाव के अपने मुख्य वादे को पूरा कर रहे हैं। सिंह की गिरफ्तारी - जो राज्य के सबसे लंबे समय से चल रहे भगोड़े मामलों में से एक और सीधे पुलिस-ड्रग गठजोड़ की जाँच से जुड़ा मामला था - पार्टी को उस अभियान के लिए एक बड़ी उपलब्धि दिखाती है। यह गिरफ्तारी तब हुई है जब सुप्रीम कोर्ट ने खुद पंजाब से उन्हें खोजने के प्रयासों का हिसाब माँगा था।
कांग्रेस और SAD जैसी विपक्षी पार्टियाँ संभवतः यह तर्क देंगी कि यह मामला AAP के सत्ता में आने से कई साल पहले शुरू हुआ था और सिंह की गिरफ्तारी में देरी - जिसमें STF और विजिलेंस ब्यूरो से बार-बार उनका बच निकलना शामिल है - निर्णायक कार्रवाई के किसी भी दावे को कमजोर करती है। निरंजन सिंह का 'वारिस पंजाब दे' में शामिल होना एक और पहलू जोड़ता है, जिससे पार्टी को ड्रग-जाँच के दौरान सख्त कार्रवाई से जुड़े अधिकारी की विश्वसनीयता का दावा करने का मौका मिलता है, जबकि AAP सिंह की गिरफ्तारी को अपनी उपलब्धि बताती है। इंदरजीत सिंह कनेक्शन
रज्जीत सिंह की मुश्किलें तब शुरू हुईं जब वे तरनतारन और बाद में मोगा के SSP थे। उस समय वे इंस्पेक्टर इंदरजीत सिंह के सुपरवाइज़र थे। इंदरजीत सिंह को 2017 में फ़ोर्स से निकाल दिया गया था। उन पर पाकिस्तान से ड्रग्स की तस्करी करने, ज़ब्त किए गए ड्रग्स को दोबारा बेचने और पैसे ऐंठने के लिए बेगुनाह लोगों पर ड्रग्स रखने का आरोप था। ड्रग्स की समस्या पर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में दायर एक PIL के बाद, दिसंबर 2017 में तीन सदस्यों वाली SIT बनाई गई। इसकी अगुवाई तत्कालीन DGP सिद्धार्थ चट्टोपाध्याय कर रहे थे। SIT को इंदरजीत के काम-काज और उसमें सिंह की कथित मिलीभगत की जाँच करनी थी।
सिंह के ख़िलाफ़ मामला ADGP हरप्रीत सिंह सिद्धू ने दर्ज किया था, जो पंजाब की स्पेशल टास्क फ़ोर्स (STF) के प्रमुख थे। सिद्धू की STF ने ही सबसे पहले इंदरजीत सिंह के ख़िलाफ़ ड्रग्स की तस्करी और ज़ब्त किए गए सामान के साथ छेड़छाड़ करने की FIR दर्ज की थी। इसी मामले में बाद में रज्जीत सिंह को भी सह-आरोपी बनाया गया। खास बात यह है कि सिंह ने विशेष रूप से सिद्धू को छोड़कर SIT जाँच की मांग की थी। उन्होंने कोर्ट से STF प्रमुख के अलावा किसी अन्य अधिकारी से स्वतंत्र जाँच कराने का अनुरोध किया था - यह अनुरोध खुद रिकॉर्ड का हिस्सा बन गया।
SIT की रिपोर्ट में शामिल सिद्धू की अपनी जाँच के नतीजे भ्रष्टाचार के पहलू से कहीं आगे थे। उन्होंने कहा कि सिंह, इंदरजीत सिंह और उनके साथियों की जाँच ज़रूरी है। आरोप था कि उन्होंने भारत और विदेश में अपराध से हुई कमाई का निवेश करने के लिए लोगों और कंपनियों का इस्तेमाल किया। ED की अपनी जाँच शुरू होने से बहुत पहले ही उन्होंने इस मामले में मनी-लॉन्ड्रिंग के पहलू की ओर इशारा कर दिया था।
SIT को क्या पता चला
फरवरी और मई 2018 के बीच सौंपी गई तीन रिपोर्टों में - जिन्हें कोर्ट ने लगभग पाँच साल तक सीलबंद रखा था - SIT ने निष्कर्ष निकाला कि रज्जीत सिंह ने इंदरजीत के ख़िलाफ़ लंबित मामलों के बावजूद उनके प्रमोशन और पोस्टिंग की सिफारिश की थी। इसमें उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करने के कुछ ही दिनों बाद दिया गया डबल प्रमोशन भी शामिल था। रिपोर्टों में 2013 के बाद से सिंह और उनके परिवार की संपत्ति में अचानक हुई बढ़ोतरी की ओर भी इशारा किया गया। साथ ही, रिश्तेदारों द्वारा कथित तौर पर "गिफ्ट" में दिए गए पैसे की और जाँच करने की सिफारिश की गई, जिसका इस्तेमाल प्रॉपर्टी खरीदने में किया गया था। बर्खास्तगी और उसके बाद के मामले
जब अप्रैल 2023 की शुरुआत में सीलबंद रिपोर्ट सार्वजनिक हुईं, तो पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अपनी सरकार के नशा-विरोधी संकल्प के तहत 17 अप्रैल को सिंह को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। इसके कुछ ही दिनों बाद दो मामले दर्ज किए गए। पहला मामला STF का था, जो 19 अप्रैल 2023 को दर्ज किया गया। इसमें इंदरजीत सिंह के खिलाफ 2018 में दर्ज FIR में सह-आरोपी के तौर पर सिंह पर NDPS एक्ट के प्रावधानों के अलावा IPC की धाराओं के तहत आपराधिक साजिश, रिकॉर्ड में हेरफेर और जबरन वसूली के आरोप लगाए गए।
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