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पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने सेवा मामलों में न्यायिक सिद्धांतों की निरंतर उपेक्षा पर चिंता व्यक्त की है और कहा है कि कर्मचारियों को अपने वैध अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई में मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति संदीप मोदगिल ने एक कर्मचारी के नियमितीकरण और परिणामी लाभों को 20 फरवरी, 2011 तक सीमित करने के पंजाब के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को स्वीकार करते हुए कहा, "यह चिंता का विषय है कि समय बीतने और बार-बार न्यायिक घोषणाओं के बावजूद, सेवा मामलों में मूलभूत सिद्धांतों की अवहेलना जारी है।"
वकील मनु के भंडारी और अर्जुन साहनी द्वारा प्रस्तुत याचिकाकर्ता ने 4 अक्टूबर, 2017 के आदेश को चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय ने आदेश को रद्द कर दिया और राज्य को निर्देश दिया कि वह लागू 2001 नीति के तहत पात्र होने की तारीख से उनकी सेवाओं को नियमित करें, परिणामी लाभ जारी करें और वास्तविक भुगतान होने तक देय तिथि से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ बकाया का भुगतान करें।
अदालत को बताया गया कि कर्मचारी को 17 मई 1996 को दैनिक वेतनभोगी माली-सह-चौकीदार के रूप में नियुक्त किया गया था। राज्य सरकार के 23 जनवरी 2001 के निर्देशों के तहत, तीन साल की सेवा पूरी करने वाले कर्मचारी नियमितीकरण के पात्र थे। 4 जून 2001 के एक आदेश में शुरू में उन्हें नियमितीकरण के लिए प्रस्तावित 10 कर्मचारियों में शामिल किया गया था। हालाँकि, बाद में उनका मामला खारिज कर दिया गया और बाद में उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। श्रम न्यायालय ने 13 अक्टूबर 2005 को समाप्ति को अवैध घोषित कर दिया।
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