पंजाब

पैरोल देने से इनकार करने पर हाईकोर्ट सख्त, ठोस आधार होना जरूरी

Kiran
17 Oct 2026 12:17 PM IST
पैरोल देने से इनकार करने पर हाईकोर्ट सख्त, ठोस आधार होना जरूरी
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Punjab पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा है कि केवल कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के आधार पर पैरोल देने से इनकार नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी तब आई जब बेंच ने NDPS मामले के एक दोषी की पैरोल अर्जी को जिला मजिस्ट्रेट द्वारा दूसरी बार खारिज किए जाने के फैसले को रद्द कर दिया। साथ ही, कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर संबंधित अधिकारी बिना ठोस कारणों के फिर से पैरोल खारिज करने का आदेश देता है, तो इस अर्जी पर पंजाब के गृह सचिव फैसला लेंगे।
इस आशंका पर कि पैरोल के दौरान कैदी भाग सकता है, बेंच ने कहा कि "डिजिटल पहचान और कैशलेस लेनदेन पर बढ़ती निर्भरता के कारण, अब किसी भगोड़े के लिए खुद को बचाए रखना और सामान्य जीवन जीना काफी मुश्किल हो गया है।" जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस हरमीत सिंह देओल की खंडपीठ ने कहा कि पैरोल के नियमों की व्याख्या और उन्हें लागू करते समय दोषी के पक्ष में उदार रुख अपनाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि "केवल अटकलें या आशंकाएं" काफी नहीं हैं, और कानून-व्यवस्था के सामान्य उल्लंघन का हवाला देकर पैरोल देने से इनकार नहीं किया जा सकता। संबंधित अधिकारी को यह स्पष्ट करना होगा कि कैदी की रिहाई से वास्तव में राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा। बेंच ने यह भी चेतावनी दी कि केवल अनुमानों के आधार पर पैरोल से वंचित करना "उन अधिकारों को कमजोर करेगा, जिनकी रक्षा के लिए पैरोल की व्यवस्था बनाई गई है।" कोर्ट ने कहा कि पैरोल खारिज करने का फैसला "ठोस और वस्तुनिष्ठ कारणों" पर आधारित होना चाहिए।
यह फैसला NDPS एक्ट के तहत 15 साल की कठोर कैद की सजा काट रहे एक दोषी की याचिका पर आया है। उसने 'पंजाब गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्परेरी रिलीज) एक्ट' के तहत आठ सप्ताह की पैरोल मांगी थी। जिला मजिस्ट्रेट ने 1 जून को उसकी अर्जी खारिज कर दी। 27 जुलाई को हाई कोर्ट ने उस आदेश को "अस्पष्ट" (cryptic) बताते हुए रद्द कर दिया और 15 दिनों के भीतर नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश दिया। 17 अगस्त को उसकी अर्जी फिर से खारिज कर दी गई। बेंच ने पाया कि दूसरे आदेश में भी पिछली कमियां दूर नहीं की गई थीं और ऐसा लगा कि अधिकारियों ने कोर्ट के निर्देशों पर "दिमाग का इस्तेमाल ही नहीं किया।"
इन कमियों में हिरासत की अवधि की गणना में विसंगति शामिल थी: पैरोल खारिज करने वाले आदेश में कहा गया था कि दोषी ने सजा के "लगभग 10 महीने" पूरे किए हैं, जबकि हिरासत प्रमाण पत्र (कस्टडी सर्टिफिकेट) में तीन साल, आठ महीने और 25 दिन का समय दर्ज था। इसके अलावा, अधिकारी यह भी नहीं बता पाए कि दोषी कथित तौर पर किस ड्रग तस्कर से जुड़ा था, और न ही उन्होंने इस जानकारी के स्रोत का खुलासा किया। अदालत ने कहा कि ये आरोप “केवल ऐसे निष्कर्ष हैं, जिनके समर्थन में कोई ठोस तर्क नहीं दिया गया है”।
पीठ ने टिप्पणी की, “चुनौती दिए गए आदेश में कई विरोधाभास हैं। डिप्टी कमिश्नर-सह-जिला मजिस्ट्रेट ने खुद लिखा है कि याचिकाकर्ता से राज्य की सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है। इसी तरह, एक अन्य पैराग्राफ में उन्होंने लिखा है कि याचिकाकर्ता से सार्वजनिक व्यवस्था (पब्लिक ऑर्डर) को भी कोई खतरा नहीं है। इन बातों को दर्ज करने के बाद भी, अधिकारी यह नहीं बता पाए कि याचिकाकर्ता को खतरनाक कैसे माना जा सकता है, या पैरोल खारिज करने के लिए उन्होंने किस ठोस आधार पर विचार किया।” पैरोल के सुधारात्मक उद्देश्य को समझाते हुए, अदालत ने कहा कि यह “एक लाभकारी कदम है, जिसका मकसद सुधार लाना और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना है”। अदालत ने यह भी कहा कि पैरोल “सजा को समाज में फिर से शामिल होने के एक अवसर में बदल देता है”। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि पैरोल “कोई अधिकार नहीं है” और अगर रिहाई समाज के हित में न हो, तो इसे खारिज किया जा सकता है।
पीठ ने सजा के विकासक्रम पर भी चर्चा की—कैसे पहले लोगों को सार्वजनिक रूप से शारीरिक कष्ट दिया जाता था और बाद में आधुनिक जेल प्रणाली आई। यह बदलाव इस समझ से आया कि अपराधियों को केवल सजा देने के बजाय उनमें सुधार लाना जरूरी है। मिशेल फूको की किताब 'डिसिप्लिन एंड पनिश' (Discipline and Punish) का हवाला देते हुए, फैसले में बताया गया कि कैसे जेल की सजा में एकांत, एक तय दिनचर्या और निगरानी का इस्तेमाल होता है। साथ ही, यह भी बताया गया कि जेल सुधारकों ने केवल कैद रखने के बजाय अपराधियों के पुनर्वास (rehabilitation) पर जोर दिया।
अदालत ने कहा कि जेल सुधार के लिए ऐसे कदम जरूरी हैं जो कैदी को “जेल की दीवारों के बाहर की जिंदगी के लिए तैयार कर सकें”। अदालत ने समझाया कि शिक्षा, नैतिक प्रशिक्षण, कैदियों का वर्गीकरण और पाबंदियों में धीरे-धीरे ढील देने का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सजा पूरी होने के बाद कैदी समाज में वापस लौट सके, न कि हमेशा के लिए समाज से बाहर हो जाए। पीठ ने कहा कि पैरोल इसी सुधारात्मक सोच का हिस्सा है, जो कैदियों को बाहरी दुनिया से फिर से जोड़ने का एक नियंत्रित जरिया है। इस बात पर जोर देते हुए कि जेल की सजा को समाज में कैदी की वापसी से अलग करके नहीं देखा जा सकता, पीठ ने कहा कि कुछ खास परिस्थितियों को छोड़कर, सजा एक निश्चित समय के लिए होती है और कैद कभी न कभी खत्म हो ही जाती है। इसका स्वाभाविक नतीजा यही है कि कैदी समाज में वापस लौटेंगे। अदालत ने कहा कि समाज में उनकी “सम्मानजनक वापसी” सुनिश्चित करने के लिए पुनर्वास (rehabilitation) बहुत जरूरी है।
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