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Punjab and Haryana पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने शुक्रवार को पंजाब के कैबिनेट मंत्री संजीव अरोड़ा की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। अरोड़ा ने अन्य बातों के अलावा यह तर्क दिया कि वह 9 मई से हिरासत में हैं। कोर्ट को यह भी बताया गया कि गुरुग्राम में 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (PMLA) के तहत विशेष न्यायाधीश के समक्ष दायर की गई उनकी नियमित जमानत याचिका 15 जून को खारिज कर दी गई थी। प्रवर्तन निदेशालय (ED) के खिलाफ दायर इस याचिका पर आदेश जस्टिस कुलदीप तिवारी ने खुली अदालत में सुनाया। अरोड़ा ने तर्क दिया कि वह पंजाब सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं और राज्यसभा के पूर्व सांसद रह चुके हैं। समाज में उनकी गहरी पैठ है और उनका सार्वजनिक रिकॉर्ड बेदाग रहा है। याचिकाकर्ता ने बताया कि वह 'M/s हैम्पटन स्काई रियल्टी लिमिटेड' (HSRL) के प्रमोटर और चेयरमैन हैं। 1987 में बनी यह कंपनी कई तरह के व्यावसायिक कार्यों में शामिल है। उनके वकील ने बताया कि कैबिनेट मंत्री का पद संभालने के बाद, याचिकाकर्ता ने कंपनी के रोजमर्रा के कामकाज में हिस्सा लेना बंद कर दिया था।
याचिकाकर्ता ने बताया कि अभियोजन पक्ष का मामला इस आरोप पर आधारित है कि HSRL ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की कुछ इकाइयों को मोबाइल फोन निर्यात किए थे। घरेलू सप्लाई चेन में शामिल कुछ इकाइयां 'शेल' (फर्जी) और डमी कंपनियां थीं, जो कथित तौर पर 'अकोमोडेशन एंट्री' (कागजी लेनदेन) और फर्जी इनवॉइस जारी करने का काम करती थीं। इन्हीं आरोपों के आधार पर, प्रतिवादी (ED) ने HSRL द्वारा किए गए निर्यात लेनदेन को 'अपराध से प्राप्त आय' (proceeds of crime) के रूप में पेश करने की कोशिश की।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला "बुनियादी तौर पर त्रुटिपूर्ण" है, क्योंकि प्रतिवादी यह साबित करने में विफल रहा है कि कोई ऐसा 'अनुसूचित अपराध' (scheduled offence) हुआ है, जिससे 'अपराध से प्राप्त आय' पैदा हुई हो और जिसका संबंध याचिकाकर्ता से हो। अरोड़ा ने तर्क दिया कि जांच के दौरान इकट्ठा की गई सामग्री से PMLA के प्रावधानों के तहत किसी अपराध के जरूरी तत्व सामने नहीं आते हैं। ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया जिससे यह पता चले कि याचिकाकर्ता ने 'अपराध से प्राप्त आय' को छिपाने, अपने पास रखने, हासिल करने, इस्तेमाल करने या उसे वैध दिखाने में कोई भूमिका निभाई हो।
HSRL द्वारा किए गए निर्यात वास्तविक व्यावसायिक लेनदेन थे, जिनके समर्थन में पूरे दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं। इन लेन-देनों के समर्थन में खरीद इनवॉइस, ई-वे बिल, GST रिकॉर्ड, शिपिंग बिल, कस्टम दस्तावेज, एयरवे बिल, बैंक रियलाइजेशन सर्टिफिकेट और विदेशी कस्टम क्लीयरेंस रिकॉर्ड मौजूद थे। निर्यात किए गए माल की कस्टम जांच की गई थी और सक्षम कस्टम अधिकारियों द्वारा "लेट एक्सपोर्ट ऑर्डर" जारी किए गए थे। भुगतान नियमित बैंकिंग चैनलों के माध्यम से प्राप्त किए गए थे और कानूनी रिकॉर्ड में विधिवत दर्ज थे।
याचिका में यह भी कहा गया है कि प्रतिवादी द्वारा याचिकाकर्ता के घर, उसके बेटे के आवास और HSRL के कार्यालय परिसर में व्यापक तलाशी ली गई, लेकिन इस दौरान कोई आपत्तिजनक दस्तावेज, बिना हिसाब-किताब वाली संपत्ति, डिजिटल रिकॉर्ड या ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता ने कोई अपराध किया है। यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता एक वरिष्ठ नागरिक हैं, जिनकी उम्र लगभग 62 वर्ष है और वे कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। पूरा मामला उन दस्तावेजों पर आधारित है जिन्हें पहले ही जब्त किया जा चुका है और जो प्रतिवादी के कब्जे में हैं। ऐसे में सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने, गवाहों को प्रभावित करने या कानून से भागने की कोई संभावना नहीं है।
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