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अबोहर। दशहरे का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। हर साल इस अवसर पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन कर बुराई के अंत का संदेश दिया जाता है। इसी परंपरा के बीच पंजाब के अबोहर में दशहरा कमेटी की ओर से समाज को नशे जैसी गंभीर बुराई से दूर रहने का संदेश देने के लिए नशे का एक पुतला भी तैयार किया गया था। हालांकि, इस पहल का अंत एक हैरान करने वाली स्थिति के साथ हुआ। रावण का पुतला तो जला दिया गया, लेकिन नशे का पुतला मैदान में ही खड़ा रह गया। कमेटी के सदस्य उसे जलाना ही भूल गए।
इस घटना के बाद नशे के खिलाफ संदेश देने की तैयारी अधूरी रह गई। जिस पुतले के जरिए लोगों को नशे के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करने की योजना बनाई गई थी, वह कार्यक्रम के बाद भी मैदान में खड़ा दिखाई दिया। ऐसे में सामाजिक बुराई के खिलाफ जागरूकता फैलाने की कोशिश महज औपचारिकता बनकर रह गई।
नशे के खिलाफ संदेश देने की थी तैयारी
दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि समाज को बुराइयों से दूर रहने की प्रेरणा देने का अवसर भी है। रावण दहन के माध्यम से लोगों को अहंकार, अन्याय और बुराई के अंत का संदेश दिया जाता है। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए अबोहर की दशहरा कमेटी ने नशे को भी एक बड़ी सामाजिक बुराई के रूप में प्रदर्शित करने की कोशिश की थी।
नशे के पुतले को तैयार करने का उद्देश्य लोगों का ध्यान इस समस्या की ओर आकर्षित करना और समाज को नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करना था। पंजाब में नशे का मुद्दा लंबे समय से सामाजिक चिंता का विषय रहा है। ऐसे में दशहरे जैसे सार्वजनिक आयोजन में इस विषय को शामिल करना जागरूकता फैलाने की एक पहल मानी जा सकती थी।
लेकिन इस पहल को उसके निर्धारित अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सका। रावण दहन का कार्यक्रम संपन्न हो गया, जबकि नशे का पुतला मैदान में ही खड़ा रह गया।
रावण दहन हुआ, लेकिन नशे का पुतला रह गया खड़ा
कार्यक्रम में सबसे चौंकाने वाली बात यही रही कि जिस पुतले के जरिए नशे के खिलाफ संदेश देने की तैयारी की गई थी, उसे जलाने की याद ही नहीं रही। नतीजतन, नशे के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध जताने की योजना पूरी नहीं हो पाई।
आमतौर पर किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में तैयारियों के साथ-साथ कार्यक्रम की पूरी रूपरेखा और उसके सभी चरणों पर ध्यान दिया जाता है। खासकर जब आयोजन का उद्देश्य किसी सामाजिक समस्या के प्रति लोगों को जागरूक करना हो, तो उससे जुड़ी गतिविधियों को पूरा करना जरूरी होता है। अबोहर में नशे का पुतला न जलाए जाने की घटना ने इसी पहलू पर सवाल खड़े किए हैं।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं है कि पुतले को जलाने का कार्यक्रम किस कारण छूट गया या इसके लिए कमेटी की ओर से कोई स्पष्टीकरण दिया गया है या नहीं। फिलहाल सामने आई जानकारी के मुताबिक, पुतला मैदान में ही खड़ा रह गया और नशे के खिलाफ संदेश देने की कोशिश अधूरी रह गई।
सामाजिक बुराई के खिलाफ प्रतीकात्मक पहल क्यों जरूरी?
नशे की लत केवल एक व्यक्ति को प्रभावित नहीं करती, बल्कि इसका असर उसके परिवार और आसपास के समाज पर भी पड़ सकता है। नशे के कारण स्वास्थ्य, पारिवारिक संबंधों और आर्थिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। इसलिए इस समस्या के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए सामाजिक संगठनों, प्रशासन और आम नागरिकों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
त्योहारों और सार्वजनिक आयोजनों के दौरान बड़ी संख्या में लोग एक जगह एकत्र होते हैं। ऐसे अवसरों का उपयोग सामाजिक संदेश देने के लिए किया जा सकता है। नशे के खिलाफ जागरूकता अभियान, युवाओं को सही दिशा में प्रेरित करने वाले कार्यक्रम और नशे की समस्या से प्रभावित लोगों की मदद से जुड़ी जानकारी समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में सहायक हो सकती है।
अबोहर में नशे का पुतला बनाने की पहल भी इसी तरह के संदेश से जुड़ी थी। लेकिन केवल पुतला तैयार कर देना पर्याप्त नहीं होता। उसके पीछे का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है, जब आयोजन के दौरान उस संदेश को लोगों तक प्रभावी तरीके से पहुंचाया जाए।
तैयारी के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी
अबोहर की घटना यह सवाल उठाती है कि सामाजिक संदेश देने के लिए की गई पहल को पूरा करने के लिए कितनी सावधानी बरती जाती है। किसी भी आयोजन में प्रतीकात्मक गतिविधियां तभी सार्थक होती हैं, जब उनका उद्देश्य स्पष्ट हो और उन्हें योजनाबद्ध तरीके से पूरा किया जाए।
दशहरे पर रावण दहन के साथ नशे के पुतले को जलाने की योजना समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश दे सकती थी। लेकिन पुतले का मैदान में ही रह जाना इस कोशिश की अधूरी तस्वीर पेश करता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि जागरूकता फैलाने के लिए केवल घोषणा या तैयारी नहीं, बल्कि उसे सही ढंग से अमल में लाना भी आवश्यक है।
फिलहाल अबोहर में दशहरा कमेटी की ओर से नशे का पुतला जलाना भूल जाने का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। जिस पहल से नशे के खिलाफ संदेश देने की उम्मीद थी, वह अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सकी। यह घटना याद दिलाती है कि सामाजिक बुराइयों के खिलाफ संदेश देना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि उस संदेश को व्यवहार में उतारने के लिए की गई तैयारी अधूरी न रह जाए।
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