पंजाब

चंडीगढ़ PG फायर केस: अब लापरवाही से मौत का मुकदमा

Saba Naaz
31 July 2026 7:59 PM IST
चंडीगढ़ PG फायर केस: अब लापरवाही से मौत का मुकदमा
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चंडीगढ़: सेक्टर-32 स्थित पेइंग गेस्ट (PG) अग्निकांड मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। साल 2020 में हुए इस दर्दनाक हादसे में तीन युवतियों की मौत हो गई थी। अब हाईकोर्ट ने पीजी संचालक नितेश बंसल और मकान मालिक गौरव अनेजा के खिलाफ लगी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 भाग-दो यानी गैर इरादतन हत्या के आरोप को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित नहीं होता कि आरोपितों को इस बात का पूर्व ज्ञान था कि उनकी लापरवाही से किसी की मौत हो सकती है।

हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब दोनों आरोपितों पर गैर इरादतन हत्या की जगह लापरवाही से मौत कारित करने यानी धारा 304-ए के तहत मुकदमा चलेगा। इसके अलावा धारा 336, 338 और 34 के तहत भी कार्रवाई जारी रहेगी। चूंकि धारा 304-ए के मामलों की सुनवाई मजिस्ट्रेट अदालत में होती है, इसलिए हाईकोर्ट ने पूरे मामले को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) की अदालत में भेजने का आदेश दिया है।

यह मामला 22 फरवरी 2020 का है, जब चंडीगढ़ के सेक्टर-32 स्थित एक पीजी में भीषण आग लग गई थी। इस हादसे में रिया, पाक्षी और मुस्कान नाम की तीन युवतियों की दम घुटने से मौत हो गई थी। वहीं फेमिना सरदाना और जैस्मिन कौर गंभीर रूप से झुलस गई थीं। आग लगने की सूचना के बाद पुलिस और दमकल विभाग की टीम मौके पर पहुंची थी और राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया गया था। घटना के तुरंत बाद पीजी संचालक नितेश बंसल को गिरफ्तार कर लिया गया था।

जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया था कि पीजी का संचालन नियमों को ताक पर रखकर किया जा रहा था। आरोप के मुताबिक, मकान में बिना जरूरी अनुमति के बड़ी संख्या में लड़कियों को रखा गया था। अधिक लोगों को ठहराने के लिए कमरों में फाइबर और लकड़ी जैसी ज्वलनशील सामग्री से अवैध पार्टिशन बनाए गए थे। इसके अलावा गलियारों और सीढ़ियों को भी काफी संकरा कर दिया गया था, जिससे आपात स्थिति में बाहर निकलना मुश्किल हो गया।

अभियोजन पक्ष का कहना था कि पीजी में आग से बचाव के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। न तो उचित अग्निशमन व्यवस्था थी और न ही सुरक्षित निकासी के लिए पर्याप्त रास्ते उपलब्ध थे। इन लापरवाहियों के कारण आग लगने के बाद युवतियां समय पर बाहर नहीं निकल सकीं और तीन की मौत हो गई।

हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जांच सामग्री से यह साबित नहीं होता कि आरोपितों को यह जानकारी थी कि उनके कार्यों से वहां रहने वाले लोगों की मृत्यु हो सकती है। अदालत ने कहा कि धारा 304 भाग-दो लगाने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी को संभावित परिणाम का ज्ञान था और इसके बावजूद उसने ऐसा काम किया।

जस्टिस वीरेंद्र अग्रवाल ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध साक्ष्य अधिकतम सुरक्षा मानकों की अनदेखी और लापरवाही को दर्शाते हैं, लेकिन यह गैर इरादतन हत्या के लिए आवश्यक कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करते। इसलिए धारा 304 भाग-दो के तहत आरोप तय करना उचित नहीं है।

हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब मामले की सुनवाई सीजेएम अदालत में होगी। पीड़ित परिवारों के लिए यह मामला लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा का विषय बना हुआ है। वहीं अदालत के इस आदेश से आरोपितों को बड़ी राहत मिली है, हालांकि उनके खिलाफ लापरवाही और अन्य धाराओं के तहत कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।

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