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Haryana हरियाणा की CBI स्पेशल मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 35.98 करोड़ रुपये के बैंक लोन बकाया मामले में एक बिज़नेसमैन को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि 'आपराधिक विश्वासघात' (criminal breach of trust) का अपराध नहीं बनता क्योंकि इसमें संपत्ति सौंपने (entrustment) की ज़रूरी शर्त पूरी नहीं हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों - जैसे CBI बनाम डंकन एग्रो इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड और सतीशचंद्र रतनलाल शाह बनाम गुजरात राज्य - का हवाला देते हुए CBI कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों को न मानने से अपने आप 'आपराधिक विश्वासघात' का मामला नहीं बनता, जब तक कि संपत्ति सौंपने का साफ़ मामला न हो।
जांच एजेंसी CBI के मुताबिक, चौधरी 'M/s सैफायर डिजिटल प्रिंटर्स' नाम से प्रिंटिंग का बिज़नेस चला रहे थे। पंजाब नेशनल बैंक ने 24 जून 2008 को फर्म को 40 लाख रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट मंज़ूर की थी, जिसे बाद में बढ़ाया और रिन्यू किया गया। उधार लेने वाले को कुल 48.27 करोड़ रुपये की क्रेडिट सुविधा दी गई, जिसमें 29 करोड़ रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट और 19.23 करोड़ रुपये का टर्म लोन शामिल था। ये सुविधाएँ पर्सनल गारंटी और चल संपत्तियों (जैसे महँगे प्रिंटर, प्लॉटर, कटिंग मशीन और स्टिचिंग मशीन) पर चार्ज (गिरवी रखने जैसा अधिकार) के ज़रिए सुरक्षित की गई थीं।
बैंक ने 31 मार्च 2018 को इस अकाउंट को नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) घोषित कर दिया, जिस पर 35.98 करोड़ रुपये बकाया थे। बाद में फर्म के परिसर के दौरे के दौरान, बैंक अधिकारियों को पता चला कि बैंक के पास गिरवी रखी गई मशीनरी और स्टॉक को बैंक की मंज़ूरी के बिना हटा दिया गया था। CBI का आरोप था कि संपत्तियों को हटाना 'आपराधिक विश्वासघात' के बराबर है।
बचाव पक्ष के वकील समीर सेठी और यवनीत ढाकला ने दलील दी कि चौधरी पर लोन सुविधा लेने के लिए बैंक के पास गिरवी रखी गई चल संपत्तियों (जैसे महँगे प्रिंटर, प्लॉटर, कटिंग मशीन, स्टिचिंग मशीन आदि) को हटाने का आरोप था। उन्होंने कहा, "लेकिन यह माना गया है कि ये सामान खुद आरोपी का ही था, और ये आरोपी के अलावा किसी और व्यक्ति की संपत्ति नहीं थे।" उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों को देखते हुए, अगर CBI के आरोपों को मान भी लिया जाए, तो भी IPC की धारा 406 के तहत ज़रूरी 'संपत्ति सौंपने' (entrustment of property) वाली बात इस मामले में साबित नहीं होती है।
CBI के स्पेशल मजिस्ट्रेट अनिल यादव ने निष्कर्ष निकाला, "...फाइल पर मौजूद रिकॉर्ड और बचाव पक्ष के वकील द्वारा बताए गए केस कानूनों को देखने से पता चलता है कि आपराधिक विश्वासघात (criminal breach of trust) का अपराध बनने के लिए संपत्ति का सौंपा जाना ज़रूरी है, और संपत्ति सौंपने की शर्तों का उल्लंघन करते हुए बेईमानी की नीयत से संपत्ति का गलत इस्तेमाल (misappropriation) होना चाहिए, लेकिन इस मामले में, सबसे पहली शर्त यानी संपत्ति का सौंपा जाना ही पूरी तरह से गायब है..." 8 अक्टूबर के फैसले में कहा गया कि इस मामले में, जिस संपत्ति को कथित तौर पर हस्तांतरित (alienated) किया गया, उसका मालिक खुद आरोपी ही था। इसमें आगे कहा गया, "इसलिए, ऊपर बताई गई कानूनी स्थिति को देखते हुए, अगर अभियोजन पक्ष की बात को मान भी लिया जाए, तो भी संपत्ति सौंपने वाली बात गायब ही रहती है, क्योंकि कोई मालिक खुद को संपत्ति कैसे सौंप सकता है?"
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