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पंजाब में पराली जलाने के मामले घटे सरकार ने गिनाए उपाय

Ratna Netam
6 Oct 2026 2:32 PM IST
पंजाब में पराली जलाने के मामले घटे सरकार ने गिनाए उपाय
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चंडीगढ़। पंजाब में पराली जलाने की समस्या को लेकर आम आदमी पार्टी के विधायक अजय गुप्ता ने मंगलवार को दावा किया कि वर्ष 2022 में AAP सरकार के सत्ता में आने के बाद से राज्य में पराली जलाने की घटनाओं में बड़ी कमी आई है। उनके मुताबिक, ऐसे मामलों की संख्या पहले के मुकाबले लगभग एक-तिहाई रह गई है। गुप्ता ने कहा कि राज्य सरकार इस समस्या को लेकर गंभीर है और किसानों को पराली जलाने के विकल्प उपलब्ध कराने के लिए कई स्तरों पर काम कर रही है।
अजय गुप्ता ने कहा कि सरकार ने पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए केवल दंडात्मक कार्रवाई पर निर्भर रहने के बजाय जागरूकता और सुविधाओं पर भी जोर दिया है। उन्होंने बताया कि किसानों को पराली प्रबंधन के बेहतर तरीकों के बारे में जानकारी दी जा रही है और इसके लिए सब्सिडी पर मशीनें उपलब्ध कराई जा रही हैं। सरकार का उद्देश्य किसानों को ऐसा विकल्प देना है, जिससे उन्हें खेतों में फसल अवशेष जलाने की जरूरत न पड़े।
गुप्ता ने कहा, “2022 में हमारी सरकार के सत्ता में आने के बाद से हमने पराली जलाने के मामलों में काफी कमी देखी है। यह पहले के मुकाबले लगभग एक-तिहाई रह गया है। सरकार इस मुद्दे को लेकर बहुत गंभीर है।” उन्होंने इस कमी का श्रेय विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और किसानों के बीच लगातार चलाए जा रहे जागरूकता अभियानों को दिया।
AAP विधायक के मुताबिक, पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए जिला प्रशासन, पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, कृषि विभाग और सहकारी समितियां मिलकर काम कर रही हैं। किसानों तक मशीनरी पहुंचाने से लेकर उन्हें पराली के वैकल्पिक उपयोग की जानकारी देने तक कई स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार का कहना है कि खेतों में पराली जलाने के बजाय उसे संसाधन के रूप में इस्तेमाल करने की दिशा में किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
अजय गुप्ता ने बताया कि किसानों को फसल अवशेषों से गांठें और पेलेट तैयार करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इनका इस्तेमाल चीनी मिलों, ईंट भट्ठों और अन्य उद्योगों में ईंधन के रूप में किया जा सकता है। इससे किसानों के सामने पराली निपटान का एक वैकल्पिक रास्ता खुलता है और खुले खेतों में इसे जलाने की जरूरत कम हो सकती है।
इसके साथ ही इन-सीटू पराली प्रबंधन पर भी जोर दिया जा रहा है। इस प्रक्रिया में मशीनों की मदद से फसल अवशेषों को खेत की मिट्टी में ही मिला दिया जाता है। गुप्ता ने कहा कि इससे प्रदूषण रोकने के साथ मिट्टी को भी फायदा मिलता है, क्योंकि पराली में मौजूद नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्व मिट्टी में बने रहते हैं और अगली फसल के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
पराली जलाने वाले किसानों पर कार्रवाई के सवाल पर गुप्ता ने कहा कि नियमों और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत जुर्माने का प्रावधान मौजूद है, लेकिन राज्य सरकार की प्राथमिकता किसानों को सजा देने से अधिक उन्हें जागरूक करना और सुविधाएं उपलब्ध कराना है। उन्होंने कहा कि सरकार किसानों को समस्या का हिस्सा नहीं, बल्कि समाधान का भागीदार बनाकर काम करना चाहती है।
हालांकि पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। मौजूदा धान कटाई सीजन के शुरुआती चरण में भी कई मामले सामने आए हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 15 से 30 सितंबर के बीच पंजाब में पराली जलाने की 59 घटनाएं दर्ज की गई थीं। इससे यह साफ है कि घटनाओं में कमी के दावों के बावजूद चुनौती अभी बनी हुई है।
केंद्र और राज्यों की ओर से पिछले कुछ वर्षों में इस समस्या पर लगातार काम किया गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2021 से 2022 के बीच पंजाब में धान की पराली जलाने की घटनाओं में करीब 30 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी। 2021 में 71,304 सक्रिय आग की घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि 2022 में यह संख्या घटकर 49,922 रह गई थी।
पराली जलाने का मुद्दा हर साल अक्टूबर और नवंबर के दौरान खास चर्चा में आता है। धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच किसानों के पास समय कम होता है। ऐसे में कई किसान खेत जल्दी साफ करने के लिए पराली जलाने का रास्ता अपनाते रहे हैं। इससे बड़े पैमाने पर धुआं पैदा होता है, जो पंजाब और आसपास के इलाकों के साथ दिल्ली-NCR की वायु गुणवत्ता को भी प्रभावित कर सकता है।
इसी वजह से इस बार भी वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने पंजाब और हरियाणा के कई जिलों में निगरानी बढ़ाई है। पंजाब के 18 और हरियाणा के 16 जिलों में फ्लाइंग स्क्वॉड तैनात किए गए हैं, जो धान कटाई के संवेदनशील सीजन में खेतों में आग की घटनाओं पर नजर रख रहे हैं।
अजय गुप्ता के बयान के बाद एक बार फिर पंजाब में पराली प्रबंधन को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चा तेज हो गई है। सरकार जहां अपनी नीतियों के कारण घटनाओं में कमी का दावा कर रही है, वहीं मौजूदा सीजन के आंकड़े बताते हैं कि समस्या अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आने वाले हफ्तों में धान की कटाई तेज होने के साथ यह देखना अहम होगा कि जागरूकता, मशीनरी और निगरानी के उपाय जमीन पर कितने प्रभावी साबित होते हैं।
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