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अमृतसर बना ग्लोबल चेस मार्केट का किंग, 40 देशों में पहुंच

Saba Naaz
19 July 2026 6:55 PM IST
अमृतसर बना ग्लोबल चेस मार्केट का किंग, 40 देशों में पहुंच
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अमृतसर। गुरु नगरी अमृतसर की पहचान अब केवल धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शहर दुनिया के शतरंज उद्योग के बड़े केंद्रों में भी शामिल हो चुका है। यहां तैयार होने वाले हस्तनिर्मित शतरंज सेट अपनी बेहतरीन कारीगरी, आकर्षक डिजाइन और खासकर घोड़े के मोहरे की बारीक नक्काशी के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। अमृतसर के रामगढ़िया कारीगरों ने इस कला को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संभालकर रखा है और इसी हुनर ने शहर को वैश्विक शतरंज बाजार में अलग पहचान दिलाई है।

अमृतसर में तैयार किए गए शतरंज सेट की मांग भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में है। करीब 50 करोड़ रुपये से अधिक के हस्तनिर्मित शतरंज सेट हर साल विदेशों में निर्यात किए जाते हैं। यूरोप, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया समेत 40 से अधिक देशों में अमृतसर के बनाए शतरंज सेट पहुंच रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर की कई प्रतियोगिताओं में इस्तेमाल होने वाले उच्च गुणवत्ता वाले शतरंज सेट भी यहीं तैयार किए जाते हैं।

अमृतसर की सबसे बड़ी खासियत शतरंज के 32 मोहरों में सबसे कठिन माने जाने वाले घोड़े की नक्काशी है। घोड़े के मोहरे को तैयार करना बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है। इसकी आंखों, कानों, चेहरे के भाव और शरीर की बनावट को लकड़ी पर बेहद सावधानी से उकेरा जाता है। इस काम में वर्षों का अनुभव और विशेष कौशल की जरूरत होती है। यही कारण है कि देश के कई अन्य राज्यों में शतरंज सेट बनाने वाले निर्माता भी अपने प्रीमियम सेट के लिए घोड़े के मोहरे अमृतसर से मंगवाते हैं।

रामगढ़िया समुदाय के लगभग 25 विशेषज्ञ कारीगर आज भी इस पारंपरिक कला को आगे बढ़ा रहे हैं। ये कारीगर आधुनिक मशीनों के दौर में भी हाथ की नक्काशी को प्राथमिकता देते हैं, जिससे हर शतरंज सेट की अपनी अलग पहचान बनती है। कई परिवारों में यह काम तीसरी और चौथी पीढ़ी तक पहुंच चुका है। बच्चे बचपन से ही लकड़ी की पहचान, मोहरों की तराशी और डिजाइन तैयार करने की कला सीखने लगते हैं।

झब्बाल रोड स्थित एक शतरंज निर्माण इकाई के संचालक ऋषि शर्मा के अनुसार, उनका परिवार कई दशकों से इस व्यवसाय से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1940-50 के दशक में शतरंज के मोहरे हाथी दांत से बनाए जाते थे, लेकिन प्रतिबंध के बाद उद्योग पूरी तरह लकड़ी पर आधारित हो गया। शुरुआती दौर में दिल्ली और मुंबई के व्यापारी अमृतसर के शतरंज सेट को विदेशों तक पहुंचाते थे। बाद में स्थानीय उद्योगपतियों ने खुद निर्यात शुरू किया और कारोबार लगातार बढ़ता गया।

अमृतसर में शतरंज बनाने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से बेहतरीन लकड़ी मंगाई जाती है। बॉक्सवुड, एबोनी यानी आबनूस, रोजवुड, पडुक और शीशम जैसी लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से लकड़ी लाई जाती है। इसे कई महीनों तक प्राकृतिक तरीके से सुखाने के बाद पारंपरिक मशीनों और हाथ के औजारों से आकार दिया जाता है।

शहर में करीब 30 इकाइयों में शतरंज सेट का निर्माण होता है। इनमें कुछ बड़े उद्योग हैं, जबकि कई छोटे और मध्यम स्तर के कारीगर भी इस काम से जुड़े हैं। यहां पांच इंच से लेकर 24 इंच तक के चेस बोर्ड और डेढ़ इंच से छह इंच तक के चेस पीस तैयार किए जाते हैं। साधारण शतरंज सेट की कीमत करीब 500 रुपये से शुरू होती है, जबकि विशेष डिजाइन और प्रीमियम गुणवत्ता वाले सेट पांच लाख रुपये तक बिकते हैं।

अमृतसर के शतरंज उद्योग में एंटीक डिजाइन वाले सेट की मांग लगातार बढ़ रही है। करीब 40 प्रतिशत ग्राहक ऐसे पारंपरिक और आकर्षक डिजाइन पसंद करते हैं। वहीं अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के बीच स्टांटन शैली के शतरंज सेट सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। देश के कई शहरों जैसे तमिलनाडु, बेंगलुरु, कोच्चि, जयपुर, जोधपुर और मैसूर में भी अमृतसर के शतरंज सेट की अच्छी मांग है।

आज अमृतसर का शतरंज उद्योग केवल एक व्यापार नहीं, बल्कि कला और विरासत का प्रतीक बन चुका है। हाथों की मेहनत, पीढ़ियों से चले आ रहे हुनर और घोड़े की बेजोड़ नक्काशी ने इस शहर को दुनिया के शतरंज बाजार में एक खास मुकाम दिलाया है।

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