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PGI ग्रांट मामले में चार्जशीट दाखिल करेगी CBI
चंडीगढ़: पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च यानी पीजीआई चंडीगढ़ के प्राइवेट ग्रांट सेल में लगभग 1.14 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं की सीबीआई जांच अंतिम चरण में पहुंच गई है। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जांच एजेंसी नवंबर में चार्जशीट दाखिल करने की तैयारी कर रही है। मामले में संस्थान से जुड़े छह कर्मचारियों समेत आठ लोगों की भूमिका जांच के दायरे में है। आरोप है कि गरीब और जरूरतमंद मरीजों के इलाज के लिए मिली सहायता राशि फर्जी दस्तावेजों के जरिए दूसरे खातों में पहुंचाई गई।
इस प्रकरण में मृत मरीजों के नाम पर भी भुगतान दिखाए जाने के आरोप सामने आए हैं। हालांकि, पूरे मामले की कथित अनियमितता लगभग 1.14 करोड़ रुपये की है और मृत मरीजों के नाम पर निकाली गई राशि इसका एक हिस्सा बताई गई है। इसलिए पूरे धन को केवल मृत मरीजों के नाम पर निकाला गया बताना सही नहीं होगा। जांच में संदिग्ध भुगतान, मरीजों के अभिलेख, दवा खरीद के कागजात और सहायता राशि प्राप्त करने वाले खातों की पड़ताल की जा रही है।
दैनिक जागरण की 31 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में दिसंबर 2025 में एफआईआर दर्ज हुई थी। सीबीआई की टीम पीजीआई के अधिकारियों और कर्मचारियों से पूछताछ कर रही है। आरोपों के केंद्र में प्राइवेट ग्रांट सेल से जुड़े लोगों और परिसर में फोटोस्टेट की दुकान चलाने वाले दुर्लभ कुमार तथा उसके साझेदार साहिल सूद के बीच कथित सांठगांठ है। जांच का विषय यह है कि मरीजों के लिए स्वीकृत राशि इन व्यक्तियों और उनसे जुड़े लोगों के खातों तक कैसे पहुंची।
एफआईआर से संबंधित पहले प्रकाशित विवरण के मुताबिक, प्राइवेट ग्रांट सेल विभिन्न सरकारी और अन्य सहायता स्रोतों से मरीजों के इलाज के लिए मिलने वाली रकम का काम देखता था। इनमें प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष, राष्ट्रीय आरोग्य निधि और अन्य संस्थाओं से मिलने वाली सहायता शामिल थी। सीबीआई का आरोप है कि भुगतान से जुड़े निर्धारित प्रावधानों को दरकिनार किया गया और फर्जी मांगपत्र, उपयोगिता प्रमाणपत्र तथा लाभार्थियों के विवरण तैयार करके रकम का दुरुपयोग किया गया।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू उस समय सामने आया, जब एक लाभार्थी महिला के पति स्वीकृत सहायता के तहत दवाएं लेने के लिए प्राइवेट ग्रांट सेल पहुंचे। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, महिला के लिए 2.5 लाख रुपये की सहायता स्वीकृत थी। जांच में पता चला कि संबंधित भौतिक फाइल नष्ट हो चुकी थी, डिजिटल रिकॉर्ड मिटा दिया गया था और लगभग 2.02 लाख रुपये एक असंबद्ध निजी व्यक्ति के खाते में पहले ही भेजे जा चुके थे। इस विसंगति ने भुगतान व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए।
इसी रिपोर्ट में तीन मृत मरीजों के नाम पर लगभग 27.66 लाख रुपये निकाले जाने का उल्लेख है। एक मामले में मरीज की मृत्यु के बाद भी 11 लाख रुपये से अधिक का भुगतान किए जाने का आरोप है। इसके अलावा लगभग 19 लाख रुपये के भुगतान में कर्मचारियों और उनके परिचितों को मरीजों के संबंधी के रूप में दिखाए जाने की बात सामने आई। इन मामलों से जुड़ी फाइलें और सॉफ्टवेयर रिकॉर्ड गायब मिलने के आरोप भी जांच का हिस्सा हैं।
आंतरिक जांच से जुड़े विवरण में दवाओं की आपूर्ति और बिलों के सत्यापन में भी अनियमितताएं बताई गई हैं। द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे भुगतान मिले जिनमें डॉक्टर की वैध सलाह, मरीज के उपचार या दवा की वास्तविक जरूरत से संबंधित दस्तावेज पर्याप्त नहीं थे। कुछ मामलों में बिलों में हेरफेर और एक ही उपचार के लिए दोहरा भुगतान किए जाने का आरोप था। 37 मरीजों की मूल फाइलें गायब मिलने का उल्लेख भी सामने आया था।
मामले में दो पूर्व संविदा कर्मचारियों की अग्रिम जमानत अर्जियां पहले खारिज हो चुकी हैं। संबंधित अदालती कार्यवाही की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों ने खुद को गलत तरीके से फंसाए जाने का दावा किया था। उनका कहना था कि उन्हें बलि का बकरा बनाया गया है और वे जांच में शामिल होने को तैयार हैं। अभियोजन ने अर्जियों का विरोध किया। अदालत ने उस चरण पर उपलब्ध सामग्री में फर्जी फाइलों और भुगतान प्रक्रिया से जुड़ी प्रथमदृष्टया भूमिका का उल्लेख किया था। यह जमानत संबंधी टिप्पणी थी, अंतिम दोषसिद्धि नहीं।
अब प्रस्तावित चार्जशीट में सीबीआई की ओर से आरोपों, संबंधित लेनदेन और प्रत्येक आरोपी की कथित भूमिका का विस्तृत विवरण रखे जाने की संभावना है। उपलब्ध ताजा रिपोर्ट चार्जशीट दाखिल करने की तैयारी से संबंधित है; इसे चार्जशीट दाखिल हो जाने की पुष्टि नहीं माना जा सकता। आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों का अंतिम निर्णय अदालत में साक्ष्यों के परीक्षण के बाद होगा। फिलहाल जांच का मुख्य प्रश्न यही है कि मरीजों के उपचार के लिए निर्धारित सहायता राशि का कथित दुरुपयोग किन दस्तावेजों और भुगतान प्रक्रियाओं के माध्यम से हुआ।
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