
बलांगीर। ओडिशा के बलांगीर जिले में न्यायिक संवेदनशीलता की एक मिसाल सामने आई है। तुशुरा JMFC कोर्ट के एक न्यायाधीश ने लकवे से पीड़ित व्यक्ति की शारीरिक परेशानी को देखते हुए खुद कोर्टरूम से बाहर आकर उससे बातचीत की और उसका बयान दर्ज किया। व्यक्ति अदालत में निर्धारित समय पर पहुंचा था, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण कोर्टरूम तक नहीं जा पा रहा था। वह कोर्ट परिसर के बाहर खड़े एक ऑटो-रिक्शा में बैठा रहा।
मामला तुशुरा पुलिस थाना क्षेत्र के अतगांव निवासी भूषण साहू से जुड़ा है। उन्हें वर्ष 2023 से संबंधित एक मामले में तुशुरा JMFC कोर्ट के सामने पेश होने के लिए बुलाया गया था। अदालत के निर्देश का पालन करते हुए साहू निर्धारित समय पर कोर्ट पहुंचे, लेकिन लकवे से प्रभावित होने के कारण उनके लिए वाहन से उतरकर कोर्टरूम तक जाना मुश्किल था।
समय पर कोर्ट पहुंचे थे भूषण साहू
जानकारी के मुताबिक भूषण साहू को 2023 के एक मामले के सिलसिले में न्यायालय में उपस्थित होना था। अपनी गंभीर शारीरिक परेशानी के बावजूद वह निर्धारित समय पर तुशुरा कोर्ट पहुंच गए।
हालांकि कोर्ट पहुंचने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी समस्या कोर्टरूम तक पहुंचने की थी। लकवे के कारण उनके लिए सामान्य रूप से चलना-फिरना मुश्किल था। ऐसे में वह जिस ऑटो-रिक्शा से अदालत पहुंचे थे, उसी में बैठे रहे।
साहू कोर्ट परिसर तक तो पहुंच गए, लेकिन शारीरिक स्थिति के कारण अंदर जाकर न्यायाधीश के सामने उपस्थित होना उनके लिए संभव नहीं हो पा रहा था।
जज को दी गई स्थिति की जानकारी
जब अदालत को भूषण साहू की स्थिति के बारे में जानकारी मिली तो मामले को संवेदनशीलता से लिया गया। सामान्य प्रक्रिया में संबंधित व्यक्ति को कोर्टरूम में उपस्थित होकर अपना बयान देना होता है, लेकिन यहां उसकी शारीरिक स्थिति एक बड़ी बाधा थी।
इसके बाद न्यायाधीश ने साहू को किसी तरह कोर्टरूम तक लाने पर जोर देने के बजाय स्वयं बाहर जाकर उनसे मिलने का फैसला किया।
जज कोर्टरूम से बाहर आए और उस ऑटो-रिक्शा तक पहुंचे, जिसमें भूषण साहू बैठे हुए थे।
ऑटो में बैठे व्यक्ति से की बातचीत
न्यायाधीश ने ऑटो-रिक्शा में बैठे भूषण साहू से बातचीत की और मामले से संबंधित आवश्यक जानकारी ली। इसके बाद उनका बयान दर्ज किया गया।
इस कदम से साहू को अपनी खराब सेहत के बावजूद कोर्टरूम तक पहुंचने की परेशानी से राहत मिली और न्यायिक प्रक्रिया भी पूरी हो सकी।
घटना के दौरान अदालत ने यह सुनिश्चित किया कि शारीरिक अक्षमता न्यायिक प्रक्रिया में भागीदारी के रास्ते में बाधा न बने।
लकवे के कारण चलना था मुश्किल
भूषण साहू लकवे से पीड़ित बताए गए हैं। ऐसी स्थिति में उनके लिए वाहन से उतरना और कोर्ट परिसर के अंदर चलकर जाना आसान नहीं था।
इसके बावजूद अदालत में उनकी उपस्थिति जरूरी होने के कारण वह ऑटो-रिक्शा से कोर्ट पहुंचे। उनकी परिस्थिति की जानकारी मिलने के बाद न्यायाधीश की ओर से दिखाई गई संवेदनशीलता ने उनके लिए प्रक्रिया आसान कर दी।
आमतौर पर गंभीर बीमारी, दिव्यांगता या चलने-फिरने में असमर्थता से जूझ रहे लोगों के लिए सरकारी और न्यायिक भवनों तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे मामलों में व्यवस्था की संवेदनशीलता महत्वपूर्ण हो जाती है।
न्यायिक प्रक्रिया के साथ मानवीय दृष्टिकोण
इस घटना ने न्यायिक प्रक्रिया में मानवीय दृष्टिकोण के महत्व को भी सामने रखा है। कानून की प्रक्रिया का पालन जरूरी है, लेकिन किसी व्यक्ति की वास्तविक शारीरिक स्थिति और परेशानी को ध्यान में रखते हुए प्रक्रिया को सुलभ बनाना भी महत्वपूर्ण है।
यहां भूषण साहू अदालत के बुलावे पर निर्धारित समय पर पहुंचे थे। उनकी ओर से कोर्ट में उपस्थित होने की कोशिश की गई, लेकिन स्वास्थ्य ने उन्हें कोर्टरूम तक पहुंचने की अनुमति नहीं दी।
ऐसी स्थिति में जज का खुद बाहर आकर बयान दर्ज करना न्यायिक प्रक्रिया और मानवीय संवेदनशीलता के बीच संतुलन का उदाहरण बना।
कोर्ट तक पहुंचना भी हो सकता है चुनौती
गंभीर बीमारी या शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे लोगों के लिए अदालत तक पहुंचना कई बार आसान नहीं होता। अदालत भवनों में रैंप, व्हीलचेयर और अन्य सुविधाएं होने के बावजूद प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक स्थिति अलग हो सकती है।
लकवे से प्रभावित व्यक्ति को वाहन से उतारकर किसी भवन के भीतर ले जाना भी कई बार जोखिमपूर्ण या बेहद कठिन हो सकता है।
भूषण साहू के मामले में उनकी स्थिति को समझते हुए कोर्ट ने व्यावहारिक रास्ता अपनाया। इससे उनका बयान भी दर्ज हो गया और उन्हें अतिरिक्त शारीरिक परेशानी का सामना भी नहीं करना पड़ा।
2023 के मामले में बुलाया गया था कोर्ट
साहू को जिस मामले में अदालत बुलाया गया था, वह वर्ष 2023 से संबंधित बताया गया है। हालांकि उपलब्ध जानकारी में मामले की प्रकृति या उसमें साहू की भूमिका के बारे में विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है।
इसलिए घटना का प्रमुख पहलू मामले के गुण-दोष के बजाय न्यायिक प्रक्रिया के दौरान दिखाई गई संवेदनशीलता है।
अदालत में उनकी उपस्थिति आवश्यक होने पर साहू ने अपनी तरफ से पहुंचने का प्रयास किया और समय पर परिसर तक आए। इसके बाद उनकी स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए न्यायाधीश स्वयं बाहर पहुंचे।
लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी घटना
जज द्वारा कोर्टरूम से बाहर आकर लकवाग्रस्त व्यक्ति का बयान दर्ज करने की घटना चर्चा का विषय बन गई। इसे न्यायिक व्यवस्था में संवेदनशीलता और जरूरतमंद व्यक्ति की परिस्थिति को समझने वाले कदम के रूप में देखा जा रहा है।
अदालत आने वाले लोगों में बुजुर्ग, दिव्यांग और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे व्यक्ति भी शामिल होते हैं। ऐसे लोगों के लिए प्रक्रिया को सुलभ बनाने की जरूरत लंबे समय से महत्वपूर्ण विषय रही है।
न्याय तक पहुंच का संदेश
तुशुरा JMFC कोर्ट की यह घटना इस बात को रेखांकित करती है कि न्याय तक पहुंच केवल अदालत में मामला सुनने तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया में व्यावहारिक रूप से शामिल होने का अवसर मिलना भी जरूरी है।
भूषण साहू अपनी बीमारी के बावजूद कोर्ट पहुंचे, लेकिन ऑटो-रिक्शा से उतरकर अंदर नहीं जा सके। उनकी स्थिति को देखते हुए न्यायाधीश ने खुद बाहर आकर उनसे बात की और बयान दर्ज किया।
इस कदम ने न्यायिक प्रक्रिया को पूरा करने के साथ एक मानवीय संदेश भी दिया कि किसी व्यक्ति की शारीरिक मजबूरी उसके लिए न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंचने में बाधा नहीं बननी चाहिए।





