ओडिशा

सत्ता बदली मगर नहीं बदली दुर्गम गांवों की तस्वीर आज भी खाट पर अस्पताल पहुंच रहे मरीज

Kavita2
12 Sept 2026 4:48 PM IST
सत्ता बदली मगर नहीं बदली दुर्गम गांवों की तस्वीर आज भी खाट पर अस्पताल पहुंच रहे मरीज
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भुवनेश्वर। ओडिशा में वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ, लेकिन दूरदराज के गांवों में सड़क और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच की समस्या अब भी सामने आ रही है। बीजू जनता दल के 24 वर्षों के शासन का अंत होने के दो वर्ष से अधिक समय बाद भी कुछ आदिवासी और दुर्गम इलाकों में मरीजों तथा गर्भवती महिलाओं को खाट या अस्थायी पालकी पर अस्पताल पहुंचाना पड़ रहा है। ऐसी घटनाएं ग्रामीण विकास और आपात चिकित्सा सेवाओं की जमीनी पहुंच पर सवाल खड़े करती हैं।

वर्ष 2024 के चुनाव में भाजपा ने 147 सदस्यीय विधानसभा में 78 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। इसके साथ बीजद का लंबे समय से चला आ रहा शासन समाप्त हुआ। सत्ता परिवर्तन के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं में सुधार की अपेक्षाएं बढ़ीं। सड़क, स्वास्थ्य और संचार जैसी सुविधाएं उन परिवारों के लिए विशेष महत्व रखती हैं, जिन्हें बीमारी या अन्य आपात स्थिति में गांव से बाहर निकलने के लिए कठिन रास्तों से गुजरना पड़ता है।

हालिया उदाहरण मयूरभंज जिले से सामने आया है। सड़क संपर्क नहीं होने के कारण एक गर्भवती महिला को लगभग सात किलोमीटर तक स्ट्रेचर पर ले जाना पड़ा। रास्ते में नदी वाले हिस्सों से भी गुजरना पड़ा। सूचना मिलने पर 108 एंबुलेंस की टीम क्षेत्र में पहुंची थी, लेकिन वाहन महिला के स्थान तक नहीं पहुंच सका। यह घटना स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध होने और जरूरतमंद तक उसके पहुंचने के बीच का अंतर दिखाती है।

इस तरह के मामलों में समस्या केवल एंबुलेंस की उपलब्धता तक सीमित नहीं रहती। वाहन पहुंच भी जाए, तो गांव तक जाने योग्य रास्ता नहीं होने पर मरीज को पहले सड़क तक लाना पड़ता है। परिवार और ग्रामीण अस्थायी साधनों से यह दूरी तय करते हैं। अस्पताल तक पहुंचने की यात्रा इस तरह कई चरणों में बंट जाती है। दुर्गम भूभाग में परिवहन की यही बाधा आपात सेवा की उपयोगिता को प्रभावित करती है और सहायता मिलने में अतिरिक्त समय लग सकता है।

एक अन्य मामला अगस्त 2025 में नबरंगपुर जिले के जोबागुड़ा गांव से सामने आया था। कीचड़ भरे रास्ते में एंबुलेंस फंसने के बाद तेज बुखार से पीड़ित 30 वर्षीय ललिता जानी को परिजनों ने लगभग दो किलोमीटर खाट पर पहुंचाया। बाद में उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। उस समय स्थानीय अधिकारी ने सड़क को वार्षिक कार्ययोजना में शामिल बताया था और स्वीकृति लंबित होने की बात कही थी। यह पिछले वर्ष का मामला है; सड़क की वर्तमान स्थिति की पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

इन उदाहरणों से यह समझ आता है कि ग्रामीण स्वास्थ्य और सड़क निर्माण को अलग-अलग विषयों की तरह देखना पर्याप्त नहीं है। अस्पताल में सेवा उपलब्ध होने के बावजूद वहां पहुंचने का रास्ता बाधित हो, तो परिवार उसका समय पर लाभ नहीं ले पाता। गांव से मुख्य सड़क, वहां से एंबुलेंस और फिर उपचार केंद्र तक की पूरी व्यवस्था महत्वपूर्ण है। किसी एक हिस्से में कमी आने पर बाकी सुविधाओं का लाभ भी सीमित हो सकता है।

बारिश के दौरान कच्चे और कीचड़ वाले रास्तों की कठिनाई विशेष रूप से सामने आती है। नबरंगपुर के मामले में भी खराब रास्ता एंबुलेंस की आवाजाही में बाधा बना था। इसलिए ग्रामीण संपर्क का आकलन केवल सड़क बनाए जाने से नहीं, बल्कि उसके उपयोग योग्य बने रहने से भी जुड़ा है। रखरखाव, जल निकासी और रास्ते के कमजोर हिस्सों की पहचान जैसे पहलू इस चर्चा में महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, हर गांव की स्थिति अलग हो सकती है और उसका अलग परीक्षण जरूरी है।

संचार सुविधा भी इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आपात स्थिति की सूचना देने, वाहन चालक को स्थान समझाने और स्वास्थ्यकर्मियों से संपर्क बनाए रखने के लिए भरोसेमंद संपर्क आवश्यक होता है। सड़क और संचार, दोनों की कमी किसी परिवार की परेशानी बढ़ा सकती है। लेकिन इन घटनाओं के आधार पर पूरे प्रदेश के नेटवर्क या सभी ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। व्यापक आकलन के लिए गांववार और विभागीय आंकड़ों की आवश्यकता होगी।

सत्ता परिवर्तन के बाद विकास की अपेक्षाओं का मूल्यांकन ऐसी जमीनी जरूरतों के संदर्भ में होना स्वाभाविक है। सरकार के सामने चुनौती लंबे समय से मौजूद समस्याओं को पहचानकर उनके समाधान को अंतिम बस्ती तक पहुंचाने की है। योजनाओं की घोषणा, स्वीकृति और वास्तविक उपयोग के बीच की दूरी कम करना महत्वपूर्ण होगा। किसी सड़क का प्रस्ताव तैयार होना और उस पर एंबुलेंस का चल पाना दो अलग चरण हैं। ग्रामीण परिवारों के लिए दूसरे चरण का पूरा होना वास्तविक राहत देता है।

ओडिशा के दुर्गम इलाकों से सामने आने वाली घटनाएं बताती हैं कि बुनियादी सुविधाओं की पहुंच पर निरंतर ध्यान जरूरी है। मयूरभंज की हालिया घटना ने सड़क संपर्क की कमी को फिर सामने रखा है। ग्रामीण विकास की सफलता का एक महत्वपूर्ण पैमाना यह भी है कि जरूरत के समय मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए परिवार को खाट उठानी पड़े या सुरक्षित परिवहन उपलब्ध हो। अब अपेक्षा ऐसी व्यवस्थाओं की है, जिनसे दूरदराज की बस्तियों तक चिकित्सा सहायता की पहुंच अधिक सहज बन सके।

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