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Odisha ओडिशा। भारतीय शतरंज के दिग्गज और विश्व चैंपियन रह चुके ग्रैंडमास्टर विश्वनाथन आनंद ने कहा है कि शतरंज का असली उद्देश्य ग्रैंडमास्टर तैयार करना नहीं, बल्कि इसे समाज के हर वर्ग और खासकर बच्चों तक पहुंचाना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि शतरंज खेलने से बच्चों को न केवल खेल का आनंद मिलता है, बल्कि उनकी शैक्षणिक क्षमता और जीवन कौशल भी मजबूत होते हैं।
भुवनेश्वर में एक कार्यक्रम के दौरान विश्वनाथन आनंद ने शतरंज और शिक्षा के आपसी संबंधों पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा, “असल लक्ष्य यह नहीं है कि हम कितने ग्रैंडमास्टर बना पाते हैं। असली मकसद यह है कि शतरंज हर बच्चे के लिए सुलभ हो। यहां तक कि जो बच्चे थोड़ा-बहुत भी शतरंज खेलते हैं, उन्हें अकादमिक रूप से फायदा मिलता है, क्योंकि इससे उनमें सही तरह के कौशल विकसित होते हैं।”
आनंद ने बताया कि शतरंज बच्चों को सोचने, निर्णय लेने और समस्याओं का समाधान खोजने की आदत डालता है। यह खेल बच्चों में एकाग्रता, धैर्य और तार्किक सोच को बढ़ाता है, जो पढ़ाई के साथ-साथ जीवन के हर क्षेत्र में उपयोगी साबित होता है। उनके अनुसार, शतरंज खेलने वाले बच्चों में गणित, विज्ञान और अन्य विषयों को समझने की क्षमता बेहतर होती है।
उन्होंने यह भी कहा कि आज के दौर में जब बच्चे मोबाइल और स्क्रीन पर ज्यादा समय बिता रहे हैं, ऐसे में शतरंज एक सकारात्मक विकल्प बन सकता है। यह न केवल मनोरंजन करता है, बल्कि मानसिक विकास में भी मदद करता है। आनंद का मानना है कि अगर स्कूल स्तर पर शतरंज को बढ़ावा दिया जाए, तो इसका असर आने वाले वर्षों में शिक्षा की गुणवत्ता पर साफ दिखाई देगा।
विश्वनाथन आनंद ने भारत में शतरंज के तेजी से बढ़ते लोकप्रियता पर भी खुशी जताई। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कई युवा और प्रतिभाशाली खिलाड़ी दिए हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर रहे हैं। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हर बच्चे का प्रोफेशनल खिलाड़ी बनना जरूरी नहीं है।
उन्होंने कहा, “हर बच्चा ग्रैंडमास्टर नहीं बनेगा और यह बिल्कुल ठीक है। अगर कोई बच्चा सिर्फ शौक के तौर पर भी शतरंज खेलता है, तो वह अपने भीतर अनुशासन, रणनीति और आत्मविश्वास जैसे गुण विकसित करता है।” आनंद के मुताबिक, यही गुण बच्चों को पढ़ाई और करियर दोनों में आगे बढ़ने में मदद करते हैं। आनंद ने सरकार, स्कूलों और सामाजिक संगठनों से अपील की कि वे शतरंज को जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिए मिलकर काम करें। उन्होंने कहा कि ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में भी शतरंज को बढ़ावा देने की जरूरत है, ताकि वहां के बच्चों को भी समान अवसर मिल सकें।
उन्होंने ओडिशा जैसे राज्यों में खेलों को लेकर बढ़ती जागरूकता की भी सराहना की और कहा कि अगर इस तरह की पहल जारी रही, तो भारत भविष्य में न केवल खेलों में बल्कि शिक्षा और बौद्धिक विकास के क्षेत्र में भी नई ऊंचाइयों को छुएगा। विश्वनाथन आनंद का मानना है कि शतरंज केवल एक खेल नहीं, बल्कि सोचने का तरीका सिखाने वाला माध्यम है। इसे बच्चों के जीवन का हिस्सा बनाकर हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर सकते हैं, जो तार्किक, आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी हो।
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