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पंजाब में पराली जलाने का सिलसिला तेज, एक दिन में 440 नए मामले

Kavita2
6 Nov 2026 5:08 PM IST
पंजाब में पराली जलाने का सिलसिला तेज, एक दिन में 440 नए मामले
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चंडीगढ़। पंजाब में धान की कटाई के साथ पराली जलाने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। राज्य में प्रदूषण नियंत्रण के लिए चलाए जा रहे अभियानों और प्रशासनिक सख्ती के बावजूद खेतों में आग लगने के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PPCB) की ओर से शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को जारी आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष 15 सितंबर से 5 नवंबर तक राज्य में पराली जलाने की कुल 2,787 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इनमें सबसे अधिक 586 मामले तरनतारन जिले में सामने आए हैं, जबकि 361 घटनाओं के साथ फिरोजपुर दूसरे स्थान पर है।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 4 नवंबर तक पंजाब में पराली जलाने की कुल 2,347 घटनाएं दर्ज हुई थीं। इसके अगले ही दिन 440 नए मामले सामने आने से कुल संख्या बढ़कर 2,787 पहुंच गई। एक दिन में इतनी बड़ी संख्या में घटनाएं दर्ज होना प्रशासन के लिए चिंता का विषय बन गया है। धान की कटाई का सीजन अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ने के बीच खेतों में फसल अवशेष जलाने की समस्या फिर गंभीर होती दिखाई दे रही है।

जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो तरनतारन पराली जलाने के मामलों में सबसे आगे बना हुआ है। यहां 586 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इसके बाद फिरोजपुर में 361, संगरूर में 240, अमृतसर में 221 और बठिंडा में 216 घटनाएं सामने आई हैं। पटियाला जिले में भी 156 मामले दर्ज किए गए हैं। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि पराली जलाने की समस्या पंजाब के कई प्रमुख कृषि जिलों में बनी हुई है।

पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, तरनतारन में कुल 553 स्थानों का निरीक्षण किया गया, जिनमें 294 स्थानों पर पराली जलाने की पुष्टि हुई। वहीं, फिरोजपुर में निरीक्षण के दौरान 163 मामलों की पुष्टि की गई। यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि उपग्रहों और अन्य निगरानी प्रणालियों से दर्ज होने वाली आग की घटनाओं की संख्या तथा मौके पर सत्यापित मामलों की संख्या अलग-अलग हो सकती है।

राज्य में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए प्रशासन की ओर से निगरानी और प्रवर्तन संबंधी कदम उठाए जा रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, इस सीजन में पराली जलाने से जुड़े मामलों में 710 एफआईआर दर्ज की गई हैं। इसके अलावा पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति के रूप में कुल 46.10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। हालांकि, इन कार्रवाइयों के बावजूद खेतों में आग लगने की घटनाएं पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सकी हैं।

पराली जलाने की समस्या मुख्य रूप से धान की कटाई के बाद खेतों में बचने वाले फसल अवशेषों के निस्तारण से जुड़ी है। पंजाब में बड़ी मात्रा में धान की खेती होती है। कटाई के बाद किसानों के सामने अगली फसल की बुवाई के लिए खेत तैयार करने की चुनौती रहती है। गेहूं की बुवाई के लिए सीमित समय मिलने के कारण कुछ किसान फसल अवशेषों को जलाने का रास्ता अपनाते हैं।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, पराली जलाना खेत तैयार करने का तेज तरीका दिखाई दे सकता है, लेकिन इससे मिट्टी की गुणवत्ता और पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। फसल अवशेष जलाने से मिट्टी में मौजूद उपयोगी सूक्ष्मजीव प्रभावित हो सकते हैं। इसके साथ ही भूमि में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

पराली जलाने से हवा में सूक्ष्म कण और अन्य प्रदूषक तत्व फैलते हैं। ये प्रदूषक सांस संबंधी परेशानियों को बढ़ा सकते हैं। विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा या अन्य श्वसन रोगों से पीड़ित लोगों के लिए प्रदूषित हवा अधिक नुकसानदायक हो सकती है।

पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं का प्रभाव केवल राज्य तक सीमित नहीं रहता। मौसम की परिस्थितियों और हवा की दिशा के अनुसार खेतों से निकलने वाला धुआं आसपास के राज्यों तथा दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता को भी प्रभावित कर सकता है। हालांकि, किसी शहर के प्रदूषण का स्तर केवल पराली जलाने से तय नहीं होता। वाहनों का धुआं, उद्योग, निर्माण कार्य, सड़क की धूल और मौसम संबंधी परिस्थितियां भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इस बार के आंकड़ों में एक महत्वपूर्ण बात यह भी सामने आई है कि कुछ जिलों में पिछले वर्ष की तुलना में घटनाएं बढ़ी हैं। 4 नवंबर 2026 तक पंजाब में 2,347 घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में 2,839 मामले सामने आए थे। यानी उस तारीख तक राज्य का कुल आंकड़ा पिछले वर्ष से 492 कम था। इसके बावजूद तरनतारन, फिरोजपुर, बरनाला और कुछ अन्य जिलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।

कृषि क्षेत्र से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, 5 नवंबर तक राज्य में धान की कटाई लगभग 87.60 प्रतिशत क्षेत्र में पूरी हो चुकी थी। ऐसे में आने वाले दिनों में शेष फसल की कटाई और गेहूं की बुवाई के दौरान पराली प्रबंधन की चुनौती बनी रह सकती है।

राज्य सरकार की ओर से किसानों को पराली प्रबंधन के वैकल्पिक तरीकों के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता पर जोर दिया जाता रहा है। इनमें हैप्पी सीडर, सुपर सीडर और अन्य कृषि उपकरणों का उपयोग शामिल है। इन मशीनों के माध्यम से फसल अवशेषों को खेत में ही प्रबंधित कर अगली फसल की बुवाई की जा सकती है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान केवल दंडात्मक कार्रवाई से संभव नहीं है। इसके लिए किसानों को सस्ती और समय पर उपलब्ध मशीनरी, फसल अवशेषों के संग्रहण की व्यवस्था तथा आर्थिक रूप से व्यवहार्य विकल्प उपलब्ध कराना भी आवश्यक है।

पराली का उपयोग पशु चारे की कुछ श्रेणियों, जैव ऊर्जा, बायोमास आधारित उद्योगों और अन्य औद्योगिक गतिविधियों में भी किया जा सकता है। हालांकि, इन विकल्पों की उपयोगिता स्थानीय परिस्थितियों, परिवहन लागत और उपलब्ध तकनीक पर निर्भर करती है।

फिलहाल पंजाब में पराली जलाने की बढ़ती घटनाएं प्रदूषण नियंत्रण के लिए चुनौती बनी हुई हैं। विशेष रूप से तरनतारन, फिरोजपुर और संगरूर जैसे जिलों में दर्ज मामलों ने प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया है।

आने वाले दिनों में धान की कटाई पूरी होने के साथ यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पराली जलाने की घटनाओं में कितनी कमी आती है। प्रशासनिक निगरानी, किसानों का सहयोग और फसल अवशेष प्रबंधन के प्रभावी उपाय ही इस समस्या को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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