
ओडिशा : बालासोर जिले में एक जंगल से पांच ओरांगुटान के बच्चों को बचाए जाने के बाद वन्यजीव तस्करी की आशंका गहरा गई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए ओडिशा पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स और वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो ने जांच तेज कर दी है। जांच एजेंसियों की नजर अब एक संदिग्ध काली एसयूवी पर टिकी है जिसे घटना से पहले जंगल के आसपास देखे जाने की जानकारी मिली है।
वन विभाग ने आठ सितंबर की सुबह भोगराई ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले बिचित्रपुर जंगल से पांच ओरांगुटान शावकों को बचाया था। भारत के जंगलों में ओरांगुटान प्राकृतिक रूप से नहीं पाए जाते हैं। ऐसे में एक साथ पांच शावकों का जंगल में मिलना जांच एजेंसियों के लिए गंभीर और असामान्य मामला बन गया है। अधिकारियों को संदेह है कि इसके पीछे वन्यजीवों की तस्करी करने वाला अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क सक्रिय हो सकता है।
शावकों के मिलने के बाद स्थानीय वन विभाग ने इसकी सूचना वरिष्ठ अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों को दी। इसके बाद ओडिशा पुलिस की एसटीएफ और वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो को जांच में शामिल किया गया। दोनों एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि ओरांगुटान को कहां से लाया गया था और उन्हें जंगल में किसने छोड़ा।
जांच में सबसे महत्वपूर्ण सुराग एक काली एसयूवी को माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि सात सितंबर की रात यह वाहन बडापाही गांव के पास देखा गया था। अगले दिन सुबह बिचित्रपुर जंगल में पांच ओरांगुटान शावक मिले। घटनाओं के समय और वाहन की मौजूदगी को ध्यान में रखते हुए जांचकर्ता एसयूवी की पहचान करने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि संदिग्ध काली एसयूवी का ओरांगुटान शावकों से सीधा संबंध था या नहीं। जांच एजेंसियां वाहन के पंजीकरण नंबर, उसमें सवार लोगों और उसके आने-जाने के मार्ग का पता लगाने में जुटी हैं। वाहन की पहचान होने के बाद यह स्पष्ट हो सकता है कि वह स्थानीय था या किसी अन्य राज्य से इलाके में पहुंचा था।
एसटीएफ ने संदिग्ध वाहन की तलाश के लिए भोगराई क्षेत्र और पश्चिम बंगाल की सीमा के पास स्थित दीघा में लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगाले हैं। अभी तक 55 कैमरों की रिकॉर्डिंग की जांच की जा चुकी है। जांचकर्ताओं द्वारा सात सितंबर की रात और आठ सितंबर की सुबह के बीच गुजरने वाले वाहनों का विवरण देखा जा रहा है।
सीसीटीवी फुटेज की जांच में काली एसयूवी के मार्ग को अलग-अलग कैमरों के माध्यम से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। किसी कैमरे में वाहन की नंबर प्लेट या उसमें सवार लोगों की तस्वीर साफ मिलने पर जांच को बड़ी दिशा मिल सकती है। सीमावर्ती इलाका होने के कारण टीम आसपास की सड़कों, टोल मार्गों और प्रवेश-निकास बिंदुओं की जानकारी भी जुटा सकती है।
अधिकारियों का मानना है कि ओरांगुटान जैसे विदेशी वन्यजीवों को भारत तक लाना किसी छोटे या स्थानीय गिरोह के लिए आसान नहीं है। इनके परिवहन के लिए अलग-अलग देशों और राज्यों से गुजरने वाला संगठित नेटवर्क सक्रिय हो सकता है। इसी वजह से मामले में अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करी की आशंका की जांच की जा रही है।
ओरांगुटान मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया के वर्षावनों में पाए जाते हैं। इनके प्राकृतिक निवास और भारत के पूर्वी तट के बीच लंबी दूरी है। पांच शावकों का बिचित्रपुर जंगल में मिलना इस संभावना को मजबूत करता है कि उन्हें अवैध तरीके से किसी अन्य देश से लाया गया हो सकता है। हालांकि उनकी उत्पत्ति और भारत पहुंचने के रास्ते की पुष्टि जांच के बाद ही होगी।
जांचकर्ताओं के सामने पहली चुनौती यह पता लगाना है कि शावकों को जंगल में छोड़ा गया था या वे किसी वाहन अथवा तस्करों की गिरफ्त से निकल गए थे। यह भी जांच का विषय है कि उन्हें किसी दूसरे स्थान तक पहुंचाया जाना था और रास्ते में पकड़े जाने के डर से छोड़ दिया गया। फिलहाल किसी संभावना को अंतिम नहीं माना गया है।
वन विभाग की टीम शावकों के स्वास्थ्य और सुरक्षा पर भी नजर रख रही है। कम उम्र के वन्यजीवों को विशेष देखभाल, उपयुक्त भोजन और नियंत्रित वातावरण की आवश्यकता होती है। यात्रा या खराब परिस्थितियों में रखे जाने से उनके स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। उनकी चिकित्सकीय जांच से उनकी उम्र, स्वास्थ्य और हाल की परिस्थितियों के बारे में उपयोगी जानकारी मिल सकती है।
जानवरों के शरीर या उनके साथ मिली किसी वस्तु की जांच भी तस्करी नेटवर्क तक पहुंचने में सहायता कर सकती है। परिवहन के दौरान इस्तेमाल किए गए कंटेनर, कपड़ा, रस्सी या दूसरे सामान मिलने पर उनसे महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त हो सकते हैं। संबंधित एजेंसियां पूरे क्षेत्र की तलाशी और स्थानीय लोगों से पूछताछ के माध्यम से जानकारी जुटा रही हैं।
बडापाही गांव और जंगल के आसपास रहने वाले लोगों से संदिग्ध गतिविधियों के बारे में जानकारी ली जा सकती है। जांचकर्ता यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि सात सितंबर की रात किसी ने वाहन से जानवर उतारते हुए देखा था या नहीं। गांव के आसपास स्थित दुकानों, मकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के कैमरे भी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
मामला पश्चिम बंगाल की सीमा के करीब सामने आया है इसलिए दूसरे राज्य की एजेंसियों के साथ समन्वय की भी आवश्यकता पड़ सकती है। संदिग्ध वाहन यदि दीघा या किसी अन्य सीमावर्ती रास्ते से गुजरा हो तो उसका रिकॉर्ड तलाशा जाएगा। जरूरत पड़ने पर दूसरे राज्यों और केंद्रीय एजेंसियों से भी जानकारी साझा की जा सकती है।
वन्यजीवों की अवैध तस्करी में अक्सर दुर्लभ प्रजातियों के बच्चों को निशाना बनाया जाता है। इन्हें विदेशी पालतू जानवरों के अवैध बाजार में ऊंची कीमत पर बेचने की कोशिश होती है। इस प्रक्रिया में जानवरों को बेहद खराब परिस्थितियों में लंबी दूरी तक ले जाया जाता है जिससे उनकी जान को गंभीर खतरा रहता है।
एसटीएफ और डब्ल्यूसीसीबी की जांच अब मुख्य रूप से संदिग्ध एसयूवी की पहचान और ओरांगुटान के संभावित परिवहन मार्ग पर केंद्रित है। 55 सीसीटीवी कैमरों के फुटेज की जांच के बावजूद अभी तक वाहन या उसमें सवार लोगों की पहचान की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। एजेंसियां अन्य कैमरों और तकनीकी सुरागों की मदद ले रही हैं।
पांच ओरांगुटान शावकों की बरामदगी ने वन्यजीव तस्करी के संभावित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। संदिग्ध काली एसयूवी मिलने पर पूरे मामले से पर्दा उठ सकता है। फिलहाल एजेंसियां सभी संभावित कड़ियों को जोड़ने और शावकों को जंगल तक पहुंचाने वाले लोगों की पहचान करने में जुटी हैं।





