ओडिशा

‘पुनश्च पृथ्वी’ कैंपेन अब हर घर की बातचीत का हिस्सा, 147 विधानसभा क्षेत्रों में ‘क्लाइमेट पंचायत’

Kavita2
2 Oct 2026 3:39 PM IST
‘पुनश्च पृथ्वी’ कैंपेन अब हर घर की बातचीत का हिस्सा, 147 विधानसभा क्षेत्रों में ‘क्लाइमेट पंचायत’
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भुवनेश्वर। उत्कल यूनिवर्सिटी में शुक्रवार से शुरू हुए तीन दिवसीय ‘अर्थ अगेन कॉन्फ्रेंस 2026’ के दौरान ‘संबाद’ और ‘कनक न्यूज’ की एडिटर तनाया पटनायक ने जलवायु परिवर्तन को लेकर चलाए जा रहे ‘पुनश्च पृथ्वी’ अभियान की प्रगति और इसके जमीनी असर पर बात की। उन्होंने कहा कि यह अभियान अब केवल जागरूकता फैलाने की पहल नहीं रह गया है, बल्कि जलवायु परिवर्तन को लेकर होने वाली बातचीत को घर-घर तक पहुंचाने का माध्यम बन गया है।

तनाया पटनायक ने कहा कि जलवायु परिवर्तन को लेकर आम लोगों के बीच चर्चा बढ़ाना अभियान का प्रमुख उद्देश्य रहा है। उनका कहना है कि पर्यावरण और जलवायु से जुड़े मुद्दों पर अक्सर विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और सरकारी संस्थाओं के स्तर पर चर्चा होती है, लेकिन उन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की स्थानीय समस्याएं और अनुभव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसी सोच के साथ ‘पुनश्च पृथ्वी’ को जमीनी स्तर पर ले जाने का प्रयास किया गया।

उन्होंने बताया कि अभियान के तहत ओडिशा के सभी 147 विधानसभा क्षेत्रों में ‘क्लाइमेट पंचायत’ आयोजित की जा रही हैं। इन पंचायतों के माध्यम से स्थानीय समुदायों को जलवायु परिवर्तन से जुड़ी अपनी चिंताओं, अनुभवों और समस्याओं को सामने रखने का अवसर दिया जा रहा है। इसके साथ ही चुने हुए जनप्रतिनिधियों को भी अपने क्षेत्र के लोगों की बात सीधे सुनने का मौका मिल रहा है।

पटनायक ने कहा कि ‘क्लाइमेट पंचायत’ का मकसद केवल चर्चा आयोजित करना नहीं, बल्कि लोगों और जनप्रतिनिधियों के बीच सीधा संवाद स्थापित करना है। उनके मुताबिक इन बैठकों में सामने आने वाली स्थानीय समस्याएं जलवायु परिवर्तन के वास्तविक प्रभावों को समझने में मदद करती हैं। अलग-अलग इलाकों के लोग मौसम में हो रहे बदलाव, तटीय समस्याओं, जलस्रोतों और पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को अपने अनुभव के आधार पर रखते हैं।

उन्होंने बताया कि इन चर्चाओं के जरिए सामने आ रही आवाजों और अनुभवों को अब एक साझा दस्तावेज का रूप दिया जा रहा है। इसके लिए ‘पीपल्स क्लाइमेट एटलस’ तैयार किया जा रहा है। पटनायक ने इसे पूरे ओडिशा में गांव स्तर पर जलवायु परिवर्तन के असर का रिकॉर्ड बताया।

उनके अनुसार, ‘पीपल्स क्लाइमेट एटलस’ में केवल आंकड़े दर्ज करना उद्देश्य नहीं है। इसमें उन समुदायों के अनुभवों और स्थानीय स्तर पर महसूस किए जा रहे बदलावों को भी दर्ज किया जा रहा है, जो सीधे पर्यावरणीय परिस्थितियों से प्रभावित हो रहे हैं। इससे राज्य के अलग-अलग हिस्सों की तस्वीर एक साथ सामने लाने में मदद मिल सकती है।

तनाया पटनायक ने कहा कि ‘पुनश्च पृथ्वी’ कैंपेन को केवल भुवनेश्वर तक सीमित रखने के बजाय अलग-अलग भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों वाले क्षेत्रों तक ले जाने पर जोर दिया गया। इस पहल का उद्देश्य उन समुदायों तक पहुंचना है, जिनका जीवन प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरणीय बदलावों से सीधे जुड़ा हुआ है।

अभियान की पहुंच भीतरकनिका तक भी हुई है। पटनायक ने बताया कि वहां मैंग्रोव के महत्व को लोगों के सामने रखने और इस प्राकृतिक तंत्र से जुड़े पर्यावरणीय पहलुओं पर चर्चा करने की कोशिश की गई। मैंग्रोव तटीय पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और तटीय क्षेत्रों की पर्यावरणीय सुरक्षा से उनका सीधा संबंध माना जाता है।

इसी तरह यह पहल गंजम जिले के बरहमपुर और आर्यपल्ली तक पहुंची। पटनायक के मुताबिक इन इलाकों में समुदाय तटीय कटाव और समुद्र के बढ़ते जलस्तर जैसी चुनौतियों को महसूस कर रहे हैं। ऐसे क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन को लेकर होने वाली बातचीत केवल सैद्धांतिक विषय नहीं है, बल्कि लोगों के जीवन और स्थानीय परिस्थितियों से सीधे जुड़ी हुई है।

उन्होंने कहा कि तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के अनुभवों को रिकॉर्ड करना बेहद जरूरी है, क्योंकि वे पर्यावरण में होने वाले बदलावों को रोजमर्रा की जिंदगी में महसूस करते हैं। तटीय कटाव, समुद्र के स्तर में बदलाव और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव जैसे मुद्दे स्थानीय समुदायों की चिंताओं का हिस्सा बन रहे हैं।

पुनश्च पृथ्वी अभियान का दायरा सिमलीपाल और देबरीगढ़ तक भी पहुंचा है। इन क्षेत्रों को शामिल करने से अभियान के जरिए तटीय क्षेत्रों के साथ-साथ वन क्षेत्रों और अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में रहने वाले समुदायों की आवाजों को भी सामने लाया जा रहा है।

पटनायक ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं दिखाई देता। कहीं तटीय समस्याएं प्रमुख हैं, तो कहीं जंगलों, कृषि और जल स्रोतों से जुड़े बदलाव अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसी वजह से अलग-अलग क्षेत्रों से लोगों की अपनी आवाजें और अनुभव इकट्ठा करना जरूरी है।

उन्होंने बताया कि ‘क्लाइमेट पंचायत’ में आम नागरिकों के साथ स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी जोड़ने की कोशिश की जा रही है। इससे लोगों की समस्याएं सीधे उन तक पहुंच सकती हैं, जो स्थानीय स्तर पर नीतियों और प्रशासनिक निर्णयों से जुड़े होते हैं। साथ ही जनता को भी अपनी बात रखने का सार्वजनिक मंच मिलता है।

‘पीपल्स क्लाइमेट एटलस’ के बारे में पटनायक ने कहा कि यह राज्यभर से एकत्र की जा रही जानकारी को एक साझा रूप देगा। गांव के स्तर पर दर्ज अनुभवों से यह समझने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग इलाकों में जलवायु परिवर्तन किस तरह महसूस किया जा रहा है और स्थानीय समुदाय किन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

उत्कल यूनिवर्सिटी में आयोजित ‘अर्थ अगेन कॉन्फ्रेंस 2026’ का केंद्रीय विषय भी पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन से जुड़े मुद्दे हैं। ऐसे में पटनायक की प्रस्तुति ने जमीनी स्तर पर पर्यावरणीय संवाद और नागरिक भागीदारी के पहलू को सामने रखा।

उन्होंने कहा कि ‘पुनश्च पृथ्वी’ के माध्यम से बातचीत को केवल विशेषज्ञ समूहों तक सीमित नहीं रखा गया। अभियान की कोशिश रही है कि गांव, समुदाय और स्थानीय स्तर पर रहने वाले लोग भी जलवायु परिवर्तन को लेकर अपनी बात कहें और अपने अनुभव साझा करें।

अभियान के तहत 147 विधानसभा क्षेत्रों में होने वाली ‘क्लाइमेट पंचायत’ इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाती है। लोगों की चिंताओं को दर्ज करना और उन्हें जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाना इस पहल का अहम हिस्सा है। पटनायक के मुताबिक इससे जलवायु परिवर्तन को लेकर स्थानीय स्तर पर अधिक सार्थक बातचीत की गुंजाइश बनती है।

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन पर चर्चा तभी प्रभावी हो सकती है, जब इसमें प्रभावित समुदायों की आवाज भी शामिल हो। अलग-अलग क्षेत्रों से जुटाए जा रहे अनुभव भविष्य में पर्यावरणीय नीतियों और स्थानीय प्राथमिकताओं को समझने में उपयोगी हो सकते हैं।

भीतरकनिका में मैंग्रोव से जुड़ी बातचीत, गंजम में तटीय कटाव और समुद्र के बढ़ते जलस्तर से प्रभावित समुदायों की चिंताएं तथा सिमलीपाल और देबरीगढ़ जैसे क्षेत्रों से जुड़ी जानकारी अभियान के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ती है। इससे ओडिशा में जलवायु परिवर्तन की बहुआयामी तस्वीर सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है।

पटनायक ने कहा कि अभियान अब जागरूकता से आगे बढ़कर संवाद और दस्तावेजीकरण के चरण में पहुंच गया है। लोगों की आवाजों को एकत्र कर ‘पीपल्स क्लाइमेट एटलस’ के रूप में तैयार किया जाना इसी दिशा का कदम है।

उन्होंने कहा कि किसी भी जलवायु नीति को प्रभावी बनाने के लिए स्थानीय परिस्थितियों को समझना जरूरी है। गांव स्तर पर लोगों द्वारा साझा की जा रही जानकारी से यह पता चल सकता है कि पर्यावरणीय बदलावों का असर किन क्षेत्रों में किस रूप में महसूस किया जा रहा है।

अभियान का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह केवल एक शहर या कुछ चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। 147 विधानसभा क्षेत्रों में क्लाइमेट पंचायत आयोजित करने की पहल इसे राज्यव्यापी संवाद का रूप देती है।

सम्मेलन में मौजूद विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और छात्रों के बीच भी इस पहल को लेकर चर्चा हुई। विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक मंच पर जमीनी अनुभवों को साझा किए जाने से शोध और स्थानीय अनुभवों के बीच संवाद की संभावना बढ़ती है।

जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन एक-दूसरे से जुड़े विषय हैं। किसी क्षेत्र में पर्यावरणीय बदलाव वहां रहने वाले समुदायों की आपदा संबंधी संवेदनशीलता को भी प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में स्थानीय अनुभवों का दस्तावेजीकरण भविष्य की तैयारी और नीति चर्चा के लिए उपयोगी हो सकता है।

तनाया पटनायक ने जोर दिया कि ‘पुनश्च पृथ्वी’ का उद्देश्य लोगों को केवल यह बताना नहीं है कि जलवायु परिवर्तन एक चुनौती है, बल्कि उन्हें इस बातचीत का सक्रिय हिस्सा बनाना भी है। यही वजह है कि अभियान ने गांवों और स्थानीय समुदायों तक पहुंच बनाने को प्राथमिकता दी है।

फिलहाल ओडिशा के 147 विधानसभा क्षेत्रों में ‘क्लाइमेट पंचायत’ के जरिए जलवायु परिवर्तन पर संवाद को आगे बढ़ाया जा रहा है। इन चर्चाओं से सामने आने वाली चिंताओं और अनुभवों को ‘पीपल्स क्लाइमेट एटलस’ में संकलित किया जा रहा है। भीतरकनिका से लेकर गंजम, सिमलीपाल और देबरीगढ़ तक पहुंची इस पहल का लक्ष्य राज्य के अलग-अलग हिस्सों से लोगों की आवाजों को एक साझा मंच पर लाना है।

उत्कल यूनिवर्सिटी में ‘अर्थ अगेन कॉन्फ्रेंस 2026’ के दौरान तनाया पटनायक का संबोधन इसी जमीनी पहल की दिशा को सामने लाने वाला रहा। उन्होंने कहा कि ‘पुनश्च पृथ्वी’ अब केवल जागरूकता अभियान नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन को लेकर लोगों के बीच होने वाली बातचीत और उनके अनुभवों को दर्ज करने की प्रक्रिया बन चुका है।

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