
भुवनेश्वर। भारत और इंडोनेशिया के बीच वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण सामने आया है। नवंबर 2024 में भारत में अवैध वन्यजीव व्यापार से बचाए गए सुमात्राण प्रजाति के एक ऑरंगुटान को करीब दो साल बाद उसके मूल देश इंडोनेशिया वापस भेज दिया गया है। भारत और इंडोनेशिया की वन्यजीव संरक्षण एजेंसियों तथा सीआईटीईएस (CITES) प्रबंधन प्राधिकरणों के संयुक्त प्रयासों से इस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा किया गया। ऑरंगुटान को गुजरात से विशेष व्यवस्था के तहत इंडोनेशिया भेजा गया, जहां वह 19 अक्टूबर 2026 को मेदान स्थित कुआलानामु अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंचा। इस अवसर पर इंडोनेशिया के वानिकी मंत्रालय की ओर से स्वागत समारोह आयोजित किया गया। भारत के महावाणिज्य दूतावास के अधिकारियों ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इस पहल को लुप्तप्राय वन्यजीवों की सुरक्षा और अवैध तस्करी के खिलाफ बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
महाराष्ट्र के ठाणे में मिला था दुर्लभ ऑरंगुटान
इस ऑरंगुटान को भारतीय वन्यजीव अधिकारियों ने 12 नवंबर 2024 को महाराष्ट्र के ठाणे जिले के डोंबिवली इलाके से बचाया था।
इंडोनेशिया के वानिकी मंत्रालय के अनुसार, बचाव के समय यह ऑरंगुटान एक अपार्टमेंट में अवैध रूप से रखा गया था। उस समय इसकी उम्र लगभग 18 से 20 महीने थी।
यह सुमात्राण ऑरंगुटान प्रजाति का नर शिशु था। इस प्रजाति का वैज्ञानिक नाम पोंगो अबेली है।
ऑरंगुटान को पहले रॉकी के नाम से जाना जाता था। इंडोनेशिया वापसी के बाद इसका नया नाम हीरा रखा गया है, जिसका अर्थ बहुमूल्य रत्न होता है।
अधिकारियों के अनुसार, यह जीव अंतरराष्ट्रीय अवैध वन्यजीव व्यापार का शिकार हुआ था।
गुजरात में करीब दो साल तक हुई देखभाल
बचाव के बाद ऑरंगुटान को गुजरात के जामनगर स्थित वन्यजीव बचाव एवं पुनर्वास केंद्र में रखा गया था।
यहां विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों और वन्यजीव संरक्षण कर्मचारियों की देखरेख में उसका उपचार और पुनर्वास किया गया।
भारतीय अधिकारियों ने उसके स्वास्थ्य, पोषण और रहने के लिए उपयुक्त वातावरण की व्यवस्था सुनिश्चित की।
कम उम्र में अवैध रूप से कैद किए गए वन्यजीवों को विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। ऐसे जीवों को दोबारा प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल बनाने के लिए लंबे समय तक निगरानी करनी पड़ सकती है।
करीब दो वर्षों की देखभाल के बाद ऑरंगुटान को इंडोनेशिया वापस भेजने की प्रक्रिया पूरी की गई।
19 अक्टूबर को इंडोनेशिया पहुंचा ऑरंगुटान
भारतीय दूतावास की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, ऑरंगुटान को गुजरात से इंडोनेशिया भेजा गया।
19 अक्टूबर 2026 को वह उत्तरी सुमात्रा के मेदान स्थित कुआलानामु अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंचा।
इंडोनेशिया के वानिकी मंत्रालय ने उसके आगमन पर स्वागत कार्यक्रम आयोजित किया।
इस कार्यक्रम में मेदान स्थित भारतीय महावाणिज्य दूतावास के अधिकारी भी शामिल हुए।
भारतीय दूतावास ने इस सफल वापसी को दोनों देशों के बीच मजबूत संबंधों और संकटग्रस्त वन्यजीव प्रजातियों की रक्षा के साझा संकल्प का प्रतीक बताया।
CITES नियमों के तहत पूरी हुई वापसी
ऑरंगुटान को वापस भेजने की प्रक्रिया में दोनों देशों के सीआईटीईएस प्रबंधन प्राधिकरणों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
सीआईटीईएस यानी लुप्तप्राय वन्य जीवों और वनस्पतियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वन्यजीवों और पौधों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार उनकी प्रजातियों के अस्तित्व के लिए खतरा न बने।
ऑरंगुटान जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय स्थानांतरण के लिए निर्धारित अनुमति, पहचान संबंधी दस्तावेज और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक होता है।
भारत और इंडोनेशिया के अधिकारियों ने संबंधित नियमों और प्रक्रियाओं के तहत ऑरंगुटान की स्वदेश वापसी सुनिश्चित की।
भारत सरकार ने देखभाल का खर्च माफ किया
इस अभियान में भारत सरकार ने एक विशेष पहल करते हुए ऑरंगुटान की देखभाल और रखरखाव पर हुए खर्च की वसूली नहीं करने का निर्णय लिया।
भारतीय दूतावास के अनुसार, भारत ने पुनर्वास अवधि के दौरान किए गए खर्च को वापस लेने की शर्त नहीं रखी।
इस कदम को दोनों देशों के बीच वन्यजीव संरक्षण सहयोग और सद्भावना के रूप में देखा जा रहा है।
भारतीय अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य लुप्तप्राय वन्यजीव को सुरक्षित तरीके से उसके मूल देश वापस पहुंचाना था।
इंडोनेशिया में पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू
इंडोनेशिया पहुंचने के बाद ऑरंगुटान को तुरंत जंगल में नहीं छोड़ा गया है।
उसे उत्तरी सुमात्रा के लंगकट क्षेत्र में स्थित सुमात्राण रेस्क्यू एलायंस के पुनर्वास केंद्र में रखा गया है।
यहां विशेषज्ञ उसके स्वास्थ्य और व्यवहार की निगरानी करेंगे।
प्राकृतिक वातावरण में लौटने से पहले ऑरंगुटान का पर्याप्त रूप से स्वस्थ और आत्मनिर्भर होना जरूरी है।
विशेषज्ञों की देखरेख में उसके भोजन जुटाने, पेड़ों पर चढ़ने और प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुकूल होने की क्षमता का आकलन किया जाएगा।
इसके बाद ही उसे जंगल में छोड़ने से संबंधित निर्णय लिया जा सकेगा।
ओडिशा से बचाए गए पांच ऑरंगुटान भी लौटेंगे
इस सफल अभियान के बाद भारत और इंडोनेशिया के अधिकारी पांच अन्य ऑरंगुटान की वापसी की प्रक्रिया पर भी काम कर रहे हैं।
इन पांच शिशु ऑरंगुटान को सितंबर 2026 में ओडिशा से बचाया गया था।
वर्तमान में इन्हें भुवनेश्वर के नंदनकानन प्राणी उद्यान में रखा गया है, जहां विशेषज्ञों की निगरानी में आवश्यक पशु चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
हालांकि, इन वन्यजीवों को इंडोनेशिया भेजने से पहले उनकी प्रजाति और मूल स्थान की पुष्टि आवश्यक है।
इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत सभी जरूरी प्रक्रियाएं पूरी की जाएंगी।
भारतीय दूतावास नवंबर 2026 में इंडोनेशिया के वन्यजीव विशेषज्ञों के भारत दौरे की व्यवस्था में भी सहयोग कर रहा है।
अवैध वन्यजीव तस्करी पर रोक लगाने की चुनौती
ऑरंगुटान विश्व की संकटग्रस्त वन्यजीव प्रजातियों में शामिल हैं। इनका प्राकृतिक आवास मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया के वर्षावनों में पाया जाता है।
विशेष रूप से सुमात्राण ऑरंगुटान का अस्तित्व जंगलों की कटाई, प्राकृतिक आवास के नुकसान और अवैध वन्यजीव व्यापार के कारण खतरे में है।
कम उम्र के ऑरंगुटान को अवैध रूप से पकड़कर बेचने की घटनाएं उनके संरक्षण के लिए गंभीर चुनौती पैदा करती हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रकार के अपराधों पर नियंत्रण के लिए देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करना और कानूनी सहयोग आवश्यक है।
वन्यजीव संरक्षण में सहयोग की मिसाल
भारत से इंडोनेशिया वापस भेजे गए इस ऑरंगुटान की कहानी अवैध तस्करी से बचाव, लंबे उपचार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का उदाहरण बन गई है।
नवंबर 2024 में बचाए जाने से लेकर अक्टूबर 2026 में स्वदेश वापसी तक विभिन्न वन्यजीव एजेंसियों ने इसकी सुरक्षा और देखभाल में योगदान दिया।
अब इंडोनेशिया के विशेषज्ञ इसके पुनर्वास की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
इस सफल अभियान से यह संदेश मिलता है कि संकटग्रस्त प्रजातियों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय समन्वय आवश्यक है। दोनों देशों का यह प्रयास भविष्य में अन्य अवैध रूप से तस्करी किए गए वन्यजीवों की सुरक्षित वापसी के लिए भी उपयोगी उदाहरण बन सकता है।





