ओडिशा
कोटिया विवाद पर सियासी घमासान CM माझी ने नवीन पटनायक पर साधा निशाना
Ratna Netam
27 Oct 2026 2:10 PM IST

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भुवनेश्वर : 27 अक्टूबर 2026। ओडिशा और आंध्र प्रदेश के बीच दशकों से चले आ रहे कोटिया सीमा विवाद को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने मंगलवार को विपक्ष के नेता और बीजू जनता दल (BJD) के अध्यक्ष नवीन पटनायक से इस संवेदनशील मुद्दे पर रचनात्मक सुझाव देने का आग्रह किया। साथ ही उन्होंने पटनायक पर सीमा विवाद का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि कोटिया क्षेत्र पर ओडिशा के अधिकारों की रक्षा के लिए उनकी सरकार प्रतिबद्ध है और इस मामले का समाधान कानूनी एवं संवैधानिक प्रक्रियाओं के जरिए किया जाएगा।
नवीन पटनायक को मुख्यमंत्री माझी का जवाब
मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने कहा कि कोटिया विवाद केवल किसी एक राजनीतिक दल का विषय नहीं, बल्कि ओडिशा की क्षेत्रीय अखंडता और राज्य के हितों से जुड़ा महत्वपूर्ण मामला है। ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप करने के बजाय सभी दलों को मिलकर समाधान की दिशा में प्रयास करना चाहिए।उन्होंने नवीन पटनायक से आग्रह किया कि वे अपने लंबे प्रशासनिक अनुभव के आधार पर सरकार को सकारात्मक और रचनात्मक सुझाव दें। मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर संयम, जिम्मेदारी और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति सम्मान बनाए रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
आंध्र प्रदेश के पंचायत चुनावों से बढ़ा विवाद
कोटिया विवाद एक बार फिर तब सुर्खियों में आया, जब आंध्र प्रदेश सरकार ने विवादित क्षेत्र के कुछ गांवों में पंचायत चुनाव कराने की तैयारी शुरू की।आंध्र प्रदेश की ओर से 3 नवंबर 2026 को फगुनासिनेरी, गंजीपदर और फाटुसिनेरी गांवों में पंचायत चुनाव कराने की अधिसूचना जारी होने की खबरों ने ओडिशा की राजनीति में हलचल पैदा कर दी।ओडिशा के कोरापुट जिले के पोट्टांगी ब्लॉक में स्थित कोटिया क्षेत्र पर दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है। क्षेत्र के 28 गांवों में से 21 गांवों पर दोनों राज्य अपना दावा जताते रहे हैं।
नवीन पटनायक ने भाजपा सरकार पर उठाए सवाल
इस विवाद को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने 19 अक्टूबर को मुख्यमंत्री माझी को पत्र लिखकर राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए थे।उन्होंने आरोप लगाया था कि भाजपा सरकार कोटिया मामले में पर्याप्त सख्ती नहीं दिखा रही है। पटनायक ने यह भी सवाल किया कि क्या केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की तेलुगु देशम पार्टी (TDP) पर राजनीतिक निर्भरता ओडिशा सरकार के रुख को प्रभावित कर रही है।नवीन पटनायक ने भाजपा को उसके 2024 के चुनावी वादों की भी याद दिलाई। उन्होंने कहा कि भाजपा ने डबल इंजन सरकार बनने पर कोटिया विवाद का स्थायी समाधान निकालने और ओडिशा की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने का भरोसा दिया था।
सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई पर जोर
मुख्यमंत्री माझी की सरकार का कहना है कि कोटिया विवाद को कानूनी और संवैधानिक तरीकों से सुलझाने का प्रयास जारी है।ओडिशा सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपनी कानूनी कार्रवाई को आगे बढ़ाने की दिशा में भी सक्रिय है। आंध्र प्रदेश की चुनाव संबंधी गतिविधियों के मद्देनजर अदालत में अवमानना याचिका को फिर से आगे बढ़ाने की तैयारी की खबरें सामने आई हैं।राज्य सरकार का मानना है कि सीमा विवाद के समाधान के लिए कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करना आवश्यक है।
बीजद ने प्रधानमंत्री मोदी से हस्तक्षेप की मांग की
इस बीच बीजू जनता दल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी कोटिया विवाद में हस्तक्षेप करने की मांग की है।25 अक्टूबर को बीजद नेताओं प्रदीप माझी और भृगु बक्सीपात्र ने भुवनेश्वर में पत्रकार वार्ता कर कहा कि मुख्यमंत्री को इस मुद्दे को प्रधानमंत्री के समक्ष उठाना चाहिए।बीजद नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि आंध्र प्रदेश विवादित गांवों में पंचायत चुनाव कराता है, तो इसे ओडिशा सरकार की विफलता माना जाएगा। पार्टी ने क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने की मांग की।
कोटिया के लोगों के भविष्य पर टिकी निगाहें
कोटिया सीमा विवाद का असर केवल ओडिशा और आंध्र प्रदेश के राजनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं है। क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए प्रशासनिक अधिकार, सरकारी योजनाओं का लाभ, स्थानीय विकास और पंचायत व्यवस्था जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं।बीजद ने जमीनी स्थिति का आकलन करने के लिए प्रतिनिधिमंडल भेजने की पहल भी की है। पार्टी का कहना है कि स्थानीय निवासियों की समस्याओं और दोनों सरकारों की गतिविधियों का अध्ययन करके आगे की रणनीति तय की जाएगी।फिलहाल मुख्यमंत्री माझी और पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के बीच बढ़ते राजनीतिक टकराव ने कोटिया विवाद को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब सबकी निगाहें राज्य सरकार की कानूनी रणनीति और आंध्र प्रदेश के प्रस्तावित पंचायत चुनावों पर टिकी हैं।
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