
Odisha ओडिशा: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने इंडोनेशिया दौरे के दौरान वहां की संसद की स्पीकर पुआन महारानी को ओडिशा की प्रसिद्ध इकत हैंडलूम भेंट की। यह उपहार भारत की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा, कारीगरों की मेहनत और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जा रहा है। ओडिशा इकत अपनी अनोखी बुनाई तकनीक, आकर्षक डिजाइन और पारंपरिक महत्व के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है।
ओडिशा इकत, जिसे स्थानीय रूप से ‘बंधा’ के नाम से भी जाना जाता है, राज्य की सबसे प्रमुख हैंडलूम सिल्क परंपराओं में से एक है। इस कला में धागों को पहले बांधा और रंगा जाता है, उसके बाद उन्हें बुनाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह प्रक्रिया बेहद कठिन और समय लेने वाली होती है, जिसमें कारीगरों को विशेष कौशल और धैर्य की आवश्यकता होती है।
इकत की खासियत यह है कि इसमें डिजाइन कपड़े की बुनाई से पहले ही धागों पर तैयार किए जाते हैं। कारीगर धागों के कुछ हिस्सों को बांधकर उन्हें अलग-अलग रंगों में रंगते हैं। इसके बाद जब इन धागों को करघे पर बुना जाता है तो कपड़े पर बेहद सुंदर और जटिल पैटर्न उभरकर सामने आते हैं।
इस पारंपरिक तकनीक के कारण ओडिशा इकत के कपड़ों में विशेष बनावट और आकर्षक डिजाइन दिखाई देते हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह है कि कपड़े के दोनों ओर लगभग एक जैसे पैटर्न दिखाई देते हैं। इसके अलावा इसमें मुलायम बनावट और घुमावदार डिजाइन इसे अन्य कपड़ों से अलग पहचान देते हैं।
ओडिशा इकत की यह कला मुख्य रूप से राज्य के संबलपुर, नुआपटना और बरगढ़ जैसे प्रमुख बुनाई केंद्रों में विकसित हुई है। इन क्षेत्रों के हजारों बुनकर पीढ़ियों से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके हाथों की बारीकी और रचनात्मकता ने इस कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है।
संबलपुरी इकत के नाम से भी प्रसिद्ध यह वस्त्र ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है। इसमें इस्तेमाल होने वाले रंग, डिजाइन और पैटर्न अक्सर स्थानीय जीवन, प्रकृति, धार्मिक परंपराओं और लोक कथाओं से प्रेरित होते हैं। यही कारण है कि यह केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि क्षेत्र की संस्कृति और इतिहास को दर्शाने वाला माध्यम भी माना जाता है।
ओडिशा इकत के डिजाइन में पारंपरिक रूप से फूल, पशु-पक्षी, ज्यामितीय आकृतियां और अन्य सांस्कृतिक प्रतीक शामिल किए जाते हैं। हर डिजाइन के पीछे एक कहानी और स्थानीय परंपरा जुड़ी होती है। बुनकर अपनी कला के माध्यम से पीढ़ियों से चली आ रही विरासत को जीवित रखते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस विशेष हस्तनिर्मित वस्त्र को विदेशी नेता को उपहार के रूप में देना भारत की ‘वोकल फॉर लोकल’ और भारतीय कला को वैश्विक मंच पर बढ़ावा देने की पहल से भी जुड़ा माना जा रहा है। भारत अपनी पारंपरिक कलाओं और हस्तशिल्प को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
ओडिशा इकत को पहले भी कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सराहना मिल चुकी है। इसकी मांग भारत के अलावा विदेशों में भी बढ़ रही है। फैशन और डिजाइन की दुनिया में भी इस पारंपरिक कला का उपयोग आधुनिक परिधानों और उत्पादों में किया जा रहा है।
बुनकरों के लिए यह कला केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि उनकी पहचान और गौरव का हिस्सा है। कई परिवार पीढ़ियों से इस काम से जुड़े हुए हैं और अपनी मेहनत से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे उपहारों के माध्यम से भारत अपनी सांस्कृतिक कूटनीति को भी मजबूत करता है। जब भारतीय हस्तशिल्प को वैश्विक नेताओं तक पहुंचाया जाता है तो इससे देश की कला, संस्कृति और स्थानीय कारीगरों को नई पहचान मिलती है।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इंडोनेशियाई संसद स्पीकर पुआन महारानी को ओडिशा इकत भेंट करना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह उपहार भारत और इंडोनेशिया के बीच सांस्कृतिक संबंधों को भी दर्शाता है।
ओडिशा इकत अपनी चमकदार रंगों, बारीक पैटर्न और पारंपरिक तकनीक के कारण आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक अनमोल विरासत बना रहेगा। यह भारतीय कारीगरों की प्रतिभा और सदियों पुरानी कला परंपरा का जीवंत उदाहरण है।





