ओडिशा

मां समलेश्वरी को चढ़ा नई फसल का भोग

Kavita2
15 Sept 2026 10:21 AM IST
मां समलेश्वरी को चढ़ा नई फसल का भोग
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संबलपुर। पश्चिमी ओडिशा के शहरों और गांवों में मंगलवार को प्रमुख कृषि पर्व नुआखाई पारंपरिक उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया। नई फसल, किसानों की मेहनत और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने वाले इस त्योहार पर लोगों ने सबसे पहले देवी-देवताओं को नए धान से तैयार चावल का भोग लगाया। इसके बाद परिवार के सदस्यों ने एक साथ बैठकर नई फसल से बने भोजन और पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लिया।

संबलपुर में नुआखाई उत्सव की शुरुआत क्षेत्र की आराध्य देवी मां समलेश्वरी को नई फसल अर्पित करने के साथ हुई। निर्धारित शुभ मुहूर्त में मंदिर के पुजारियों ने नए धान से तैयार ‘नबान्न’ देवी को चढ़ाया। इसके बाद मंदिर में मौजूद श्रद्धालुओं ने मां समलेश्वरी की पूजा-अर्चना की और अपने परिवार, कृषि तथा क्षेत्र की खुशहाली की कामना की।

इस वर्ष नुआखाई के लिए निर्धारित लग्न सुबह 9 बजकर 40 मिनट से 9 बजकर 54 मिनट के बीच था। तुला लग्न और वृषभ नवांश के दौरान मां समलेश्वरी को नई फसल का भोग अर्पित किया गया। पूजा का शुभ समय पुजारियों और ज्योतिषियों ने पारंपरिक गणना के आधार पर पहले ही तय कर लिया था। इसके लिए ब्रह्मपुरा मंदिर में विशेष बैठक आयोजित की गई थी।

मां समलेश्वरी को नबान्न अर्पित किए जाने के बाद पश्चिमी ओडिशा के घरों में पारिवारिक पूजा शुरू हुई। परिवारों ने अपने कुल देवी-देवताओं और ग्राम देवी को नए धान से तैयार चावल, मिठाइयां तथा स्थानीय व्यंजन अर्पित किए। धार्मिक अनुष्ठान पूरा होने के बाद सभी सदस्यों ने साथ बैठकर नया चावल ग्रहण किया। मान्यता है कि देवी को अर्पित किए बिना नई फसल का सेवन नहीं किया जाता।

नुआखाई शब्द दो स्थानीय शब्दों से मिलकर बना है। इसमें ‘नुआ’ का अर्थ नया और ‘खाई’ का अर्थ खाना या ग्रहण करना है। इस तरह नुआखाई का शाब्दिक अर्थ नई फसल का भोजन करना है। यह त्योहार किसानों द्वारा उपजाए गए नए धान का स्वागत करने और अच्छी फसल के लिए प्रकृति एवं देवी-देवताओं के प्रति आभार जताने का अवसर माना जाता है।

यह पर्व ओडिया महीने भाद्रबा के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। परंपरा के अनुसार, गणेश चतुर्थी के अगले दिन नुआखाई का आयोजन होता है। पश्चिमी ओडिशा में इसका महत्व केवल कृषि उत्सव तक सीमित नहीं है। यह परिवार, समाज, परंपरा, आपसी मेल-मिलाप और सांस्कृतिक पहचान का भी बड़ा पर्व है।

संबलपुर के साथ बरगढ़, बलांगीर, सुबरनपुर, कालाहांडी, नुआपाड़ा, झारसुगुड़ा, सुंदरगढ़, बौध और देवगढ़ सहित पश्चिमी क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में त्योहार की रौनक दिखाई दी। सुबह से मंदिरों और घरों में पूजा-अर्चना का क्रम चला। लोग पारंपरिक परिधान पहनकर एक-दूसरे के घर पहुंचे और “नुआखाई जुहार” कहकर शुभकामनाएं दीं।

नुआखाई के दौरान परिवार के छोटे सदस्य अपने माता-पिता, दादा-दादी और अन्य बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं। इस परंपरा को ‘नुआखाई जुहार’ कहा जाता है। समान उम्र के लोग एक-दूसरे से मिलकर शुभकामनाएं देते हैं। पर्व पर पुराने मतभेद भुलाकर रिश्तों को नए सिरे से मजबूत करने की परंपरा भी रही है।

रोजगार, शिक्षा या कारोबार के लिए प्रदेश और देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले लोग नुआखाई के अवसर पर अपने पैतृक गांव और घर लौटते हैं। इससे संयुक्त परिवारों को एक साथ समय बिताने का अवसर मिलता है। गांवों में सामूहिक भोज और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। पारंपरिक गीत, नृत्य और वाद्ययंत्र त्योहार के माहौल को और आकर्षक बनाते हैं।

इस अवसर पर घरों में नए चावल के साथ विभिन्न प्रकार के पारंपरिक पकवान तैयार किए गए। परिवार की महिलाएं कई दिन पहले से त्योहार की तैयारी में जुट गई थीं। घरों की सफाई, नए कपड़ों की खरीदारी और पूजा सामग्री की व्यवस्था की गई। ग्रामीण बाजारों में नए कपड़ों, मिठाइयों, फलों, सब्जियों और पूजा सामग्री की मांग बढ़ी।

कृषि आधारित परिवारों के लिए यह पर्व नई उपज के प्रति सम्मान की भावना को प्रदर्शित करता है। किसान अपनी पहली फसल देवी को समर्पित कर यह स्वीकार करते हैं कि खेती केवल मानवीय मेहनत पर निर्भर नहीं है। मिट्टी, पानी, वर्षा, सूर्य और प्रकृति का संतुलन भी अच्छी उपज के लिए आवश्यक है। इसलिए नुआखाई को प्रकृति और मनुष्य के संबंध का पर्व भी कहा जाता है।

इस वर्ष अच्छी वर्षा और बेहतर कृषि परिस्थितियों ने त्योहार के उत्साह को और बढ़ा दिया। किसानों ने आने वाले कृषि मौसम में अच्छी उपज और परिवार की समृद्धि के लिए प्रार्थना की। कई स्थानों पर किसान नए धान की बालियां लेकर स्थानीय देवी के मंदिर पहुंचे। पूजा के बाद प्रसाद को परिवार और पड़ोसियों में बांटा गया।

ओडिशा हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती आयोग की जानकारी के अनुसार, नुआखाई मां समलेश्वरी मंदिर के प्रमुख त्योहारों में शामिल है। इस अवसर पर किसान अपनी जमीन की पहली उपज व्यक्तिगत उपयोग से पहले देवी को अर्पित करते हैं। मां समलेश्वरी को पश्चिमी ओडिशा की आराध्य देवी के रूप में पूजा जाता है। समलेश्वरी मंदिर की आधिकारिक जानकारी में भी नुआखाई को पूरे पश्चिमी क्षेत्र का प्रमुख पर्व बताया गया है।

त्योहार के अगले चरण में विभिन्न स्थानों पर ‘नुआखाई भेंटघाट’ कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इनमें सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों से जुड़े लोग एक स्थान पर जुटकर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। लोक कलाकार पारंपरिक गीत और नृत्य प्रस्तुत करते हैं। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को क्षेत्र की भाषा, संगीत, पहनावे और सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ने का माध्यम बनते हैं।

नुआखाई आधुनिकता के बीच पश्चिमी ओडिशा की कृषि और सामाजिक परंपरा को जीवित रखने वाला पर्व है। नई फसल के भोग से शुरू हुआ उत्सव बुजुर्गों के आशीर्वाद, पारिवारिक भोज और सामुदायिक मिलन के साथ आगे बढ़ा। खेतों से लेकर मंदिरों और घरों तक लोगों ने “नुआखाई जुहार” के साथ खुशहाली और सामाजिक सद्भाव का संदेश दिया।

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