
Odisha ओडिशा: सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा के एक उम्रकैद की सजा पाए कैदी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है, जो पिछले 22 साल से अधिक समय से जेल में बंद है। अदालत ने ओडिशा हाई कोर्ट के उस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें उसकी आपराधिक अपील को लगभग नौ साल की देरी के आधार पर खारिज कर दिया गया था।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ ने इस मामले को “बहुत परेशान करने वाला” बताते हुए कहा कि हाई कोर्ट को अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कैदी को कम से कम उसकी अपील पर मेरिट के आधार पर सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए था।
यह मामला अर्जुन जानी उर्फ टुनटुन की याचिका से जुड़ा है, जिसने ओडिशा हाई कोर्ट के 11 जनवरी 2016 के आदेश को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने हत्या के एक मामले में उसकी सजा के खिलाफ दायर आपराधिक अपील में 3,157 दिनों (लगभग नौ साल) की देरी को माफ करने से इनकार कर दिया था और अपील को समय-सीमा पार मानते हुए खारिज कर दिया था।
याचिकाकर्ता को 25 अगस्त 2006 को ओडिशा के नबरंगपुर में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और 201 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि अपील बहुत लंबी देरी से दायर की गई है और देरी माफी के लिए कोई उचित कारण प्रस्तुत नहीं किया गया है। अदालत ने कहा था कि “3157 दिनों से अधिक की देरी को माफ करने का कोई ठोस आधार नहीं है”, जिसके चलते देरी माफी की अर्जी और अपील दोनों खारिज कर दी गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण पर असहमति जताते हुए कहा कि न्याय व्यवस्था में तकनीकी आधार पर किसी व्यक्ति को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब वह लंबे समय से जेल में बंद हो।
इस फैसले के बाद कैदी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया है और मामले की सुनवाई मेरिट के आधार पर आगे जारी रखने की बात कही गई है।





