
Odisha ओडिशा: रायगढ़ा जिले में अंतिम संस्कार को लेकर एक विवादित घटना सामने आई है, जहां एक 65 वर्षीय आदिवासी व्यक्ति को गांव के श्मशान घाट में दफनाने की अनुमति न मिलने के बाद उसके परिवार की निजी कृषि भूमि पर अंतिम संस्कार करना पड़ा। इस घटना के चलते पूरे इलाके में तनाव और बहस का माहौल बन गया है।
यह मामला रायगढ़ा ब्लॉक के गाजीगांव गांव का है, जहां मृतक की पहचान जकाका डैम के रूप में हुई है। बताया गया है कि उन्होंने लगभग चार से पांच साल पहले ईसाई धर्म अपना लिया था। वह पिछले कुछ महीनों से बीमार चल रहे थे और गुरुवार सुबह करीब 8 बजे उनका निधन हो गया।
परिवार के अनुसार, वे मृतक का अंतिम संस्कार ईसाई रीति-रिवाजों के अनुसार गांव के स्थानीय श्मशान घाट में करना चाहते थे। लेकिन गांव के कुछ लोगों ने इस पर आपत्ति जताई और कथित तौर पर दफनाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।
ग्रामीणों का कहना था कि गांव का श्मशान घाट पारंपरिक रूप से हिंदू आदिवासी समुदाय के दाह संस्कार के लिए आरक्षित है और वहां केवल दाह संस्कार की ही अनुमति है, न कि दफनाने की। इस विरोध के कारण अंतिम संस्कार की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
ग्रामीणों ने यह भी कथित तौर पर कहा कि ईसाई व्यक्ति को श्मशान घाट में दफनाने से उनकी धार्मिक परंपराओं का उल्लंघन होगा और गांव की देवी झंगिडी देवी की मान्यताओं को ठेस पहुंच सकती है। इस विवाद के कारण परिवार को लंबे समय तक असमंजस और दबाव की स्थिति का सामना करना पड़ा।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि मृतक का अंतिम संस्कार 26 घंटे से अधिक समय तक टलता रहा। परिवार ने गुरुवार को पूरे दिन प्रयास किया, लेकिन सहमति न बनने के कारण शव को अंतिम संस्कार के लिए स्थान नहीं मिल सका और वह घर पर ही रखा रहा।
अंततः हालात को देखते हुए परिवार ने मजबूरी में अपने निजी कृषि भूमि पर ही अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। वहां देर से अंतिम संस्कार किया गया, जिससे परिवार और ग्रामीणों के बीच तनाव और बढ़ गया।
स्थानीय स्तर पर इस घटना को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे परंपरा और धार्मिक मान्यताओं से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कई लोग इसे व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता और मानवीय अधिकारों से जुड़ा मामला बता रहे हैं।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि अंतिम संस्कार में धर्म के आधार पर भेदभाव एक गंभीर मुद्दा है और ऐसे मामलों में प्रशासन को स्पष्ट और निष्पक्ष हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि किसी भी परिवार को इस तरह की स्थिति का सामना न करना पड़े।
ग्रामीण क्षेत्रों में पहले भी ऐसे विवाद सामने आते रहे हैं, जहां धार्मिक परिवर्तन के बाद अंतिम संस्कार को लेकर मतभेद पैदा होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों में सामाजिक संवाद और स्पष्ट नियमों की आवश्यकता है ताकि भविष्य में टकराव की स्थिति न बने।
फिलहाल प्रशासन की ओर से इस मामले पर नजर रखी जा रही है और स्थानीय स्तर पर स्थिति को शांत करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
यह घटना एक बार फिर इस बात को उजागर करती है कि ग्रामीण इलाकों में धार्मिक परंपराओं और व्यक्तिगत आस्था के बीच संतुलन स्थापित करना कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।





