
कटक: ओडिशा हाई कोर्ट ने पाठ्यपुस्तकों के लिए कागज़ खरीदने के टेंडर के लिए राज्य सरकार की पात्रता शर्तों में दखल देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि संबंधित अधिकारियों को अपनी ज़रूरतों के हिसाब से शर्तें तय करने की काफी आज़ादी है, बशर्ते वे शर्तें उचित हों और उनमें मनमानापन या गलत इरादा न हो।
चीफ जस्टिस हरीश टंडन और जस्टिस चित्तरंजन डैश की डिवीज़न बेंच ने 7 अक्टूबर को एक प्राइवेट कागज़ सप्लायर की रिट याचिका को खारिज करते हुए कहा कि टेंडर प्रक्रियाओं से जुड़े प्रशासनिक फैसलों में दखल देने से पहले अदालतों को सावधानी बरतनी चाहिए।
बेंच ने कहा, "हर प्रशासनिक कार्रवाई में दखल देने की ज़रूरत नहीं होती, इसलिए कोर्ट को उनमें दखल देने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए।" बेंच ने टेंडर की शर्तें तय करने में अधिकारियों के विवेक का सम्मान करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।
यह विवाद 11 सितंबर को 'टेक्स्टबुक प्रोडक्शन एंड मार्केटिंग डायरेक्टोरेट' द्वारा जारी एक टेंडर से शुरू हुआ था। यह टेंडर पाठ्यपुस्तकों के उत्पादन के लिए 84 सेमी आकार और वॉटरमार्क वाले 26,450 मीट्रिक टन 70 GSM मैपलिथो रील पेपर की सप्लाई के लिए था। टेक्निकल बिड खोलने की तारीख 8 अक्टूबर तय की गई थी।
पात्रता की शर्तों में से एक शर्त यह थी कि बोली लगाने वालों को सरकारी या अर्ध-सरकारी विभागों या संगठनों को वॉटरमार्क वाले मैपलिथो वर्जिन पेपर की सप्लाई का अनुभव दिखाना होगा। यह अनुभव पिछले लगातार तीन वर्षों में से हर साल टेंडर की मात्रा के कम से कम 60 प्रतिशत या सालाना कम से कम 11,000 टन के बराबर होना चाहिए था।
याचिकाकर्ता ने इस शर्त को चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि यह बहुत ज़्यादा और मनमानी थी, और इसे भाई-भतीजावाद और पक्षपात के ज़रिए कुछ खास सप्लायर्स को फायदा पहुँचाने के लिए बनाया गया था। उसने तर्क दिया कि वॉटरमार्क वाले पेपर की शर्त का पाठ्यपुस्तक की छपाई से कोई सीधा संबंध नहीं था और इससे काबिल बोली लगाने वाले भी बाहर हो जाते। उसने यह भी कहा कि सालाना सप्लाई की शर्त ने कुछ स्थापित कंपनियों तक ही भागीदारी सीमित करके प्रतिस्पर्धा को भी कम कर दिया।





