
भुवनेश्वर: हाल ही में राजधानी में 'किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015: लागू होने के 10 साल और आगे की राह' पर राज्य-स्तरीय स्टेकहोल्डर्स (हितधारकों) की बैठक हुई। इसमें न्यायपालिका, पुलिस, शिक्षा और महिला एवं बाल विकास विभागों के स्टेकहोल्डर्स ने बाल संरक्षण और किशोर न्याय के अहम पहलुओं पर चर्चा की।
बैठक को संबोधित करते हुए, ओडिशा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस हरीश टंडन ने किशोर न्याय में रोकथाम को प्राथमिकता देने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा, "हमें ज़मीनी स्तर पर उन कमज़ोरियों को दूर करना होगा जिनकी वजह से बच्चे कानून के दायरे में आते हैं या उन्हें संस्थागत देखभाल में जाना पड़ता है।"
उद्घाटन सत्र में ओडिशा हाई कोर्ट की किशोर न्याय समिति की चेयरपर्सन जस्टिस सावित्री राथो और महिला एवं बाल विकास सचिव मृणालिनी डार्सवाल ने JJ एक्ट और ओडिशा में इसके कार्यान्वयन का ब्यौरा पेश किया। साथ ही, यूनिसेफ ओडिशा के फील्ड ऑफिस प्रमुख प्रशांत दास ने इसके कार्यान्वयन के 10 वर्षों और रोकथाम के तरीकों पर अपने विचार रखे।
तकनीकी चर्चाएँ चार अलग-अलग विषयों पर पैनल चर्चाओं के ज़रिए आयोजित की गईं। पहला पैनल 'कानून के दायरे में आए बच्चों के अधिकारों' पर केंद्रित था, जिसमें गंभीर अपराधों के शुरुआती आकलन पर बात हुई। वहीं, दूसरे पैनल ने 'देखभाल और संरक्षण की ज़रूरत वाले बच्चों के अधिकारों' पर चर्चा की।
तीसरे पैनल का फोकस 'परिवार-आधारित देखभाल और गोद लेने की प्रक्रिया' पर था, जिसमें परिवार से अलग होने से बचाव, गोद लेने और फोस्टर केयर (अस्थाई देखभाल) जैसे मुद्दे शामिल थे। चौथे पैनल ने 'बच्चों के ख़िलाफ़ अपराधों' पर चर्चा की, जिसमें बच्चों के ख़िलाफ़ अपराधों को रोकने और पुलिस व अदालतों द्वारा बच्चों के अनुकूल प्रक्रियाएँ अपनाने पर ज़ोर दिया गया।





