
कोइड़ा: सुंदरगढ़ जिले का कोइड़ा खनन क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव विविधता और प्राकृतिक संपदा के लिए पूरे राज्य में जाना जाता है। कभी घने जंगलों और हरियाली से भरपूर यह इलाका अब तेजी से बदल रहा है। खनिज संपदा की बढ़ती मांग और लगातार विस्तार करते खनन कार्यों के कारण क्षेत्र के संरक्षित जंगलों पर गंभीर संकट मंडराने लगा है।
स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि खनन गतिविधियों के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की गई है, जिससे हजारों एकड़ वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। कभी घने जंगलों से ढका रहने वाला इलाका अब कई स्थानों पर वीरान नजर आने लगा है। जंगलों के सिमटने से न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर भी असर पड़ रहा है।
कोइड़ा क्षेत्र लौह अयस्क समेत कई महत्वपूर्ण खनिजों के लिए प्रसिद्ध है। यहां लंबे समय से खनन गतिविधियां संचालित हो रही हैं। खनिज उत्पादन से क्षेत्र और राज्य की अर्थव्यवस्था को लाभ जरूर मिला है, लेकिन इसके साथ ही पर्यावरणीय चुनौतियां भी बढ़ी हैं। खनन परियोजनाओं के विस्तार के लिए जंगलों की जमीन का उपयोग और पेड़ों की कटाई लगातार चिंता का विषय बनी हुई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते, बल्कि वे एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करते हैं। जंगलों के खत्म होने से मिट्टी का कटाव बढ़ता है, जल स्रोत प्रभावित होते हैं और वन्यजीवों के रहने और भोजन की व्यवस्था पर असर पड़ता है। कोइड़ा जैसे जैव विविधता वाले क्षेत्र में वन क्षेत्र का कम होना पर्यावरण संतुलन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पहले क्षेत्र में चारों ओर हरियाली दिखाई देती थी। जंगलों में कई प्रकार के पेड़-पौधे और वन्यजीव पाए जाते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में खनन गतिविधियों के विस्तार के कारण प्राकृतिक स्वरूप में बड़ा बदलाव आया है। कई जगहों पर जंगलों की जगह खदानें और खनन से जुड़ी गतिविधियां दिखाई देने लगी हैं।
वनों की कटाई का असर स्थानीय जीवन पर भी पड़ रहा है। जंगलों पर निर्भर रहने वाले ग्रामीणों को अब पहले जैसी वन उपज नहीं मिल पा रही है। इसके अलावा जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवास कम होने से मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में भी बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है।
हालांकि खनन कंपनियों की ओर से पर्यावरण संरक्षण के लिए पौधारोपण और पुनर्वनीकरण जैसे कदम उठाए जाने का दावा किया जाता है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि प्राकृतिक जंगलों की भरपाई केवल नए पौधे लगाने से नहीं हो सकती। पुराने जंगलों में मौजूद जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन को दोबारा स्थापित करना बेहद कठिन होता है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। खनन क्षेत्र में वैज्ञानिक तरीके अपनाने, वन संरक्षण कानूनों का सख्ती से पालन करने और प्रभावित क्षेत्रों में प्रभावी पुनर्वास एवं पुनर्वनीकरण योजनाएं लागू करने की आवश्यकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि खनन परियोजनाओं की निगरानी मजबूत होनी चाहिए, ताकि निर्धारित सीमा से अधिक वन क्षेत्र प्रभावित न हो। साथ ही स्थानीय समुदायों को भी पर्यावरण संरक्षण की योजनाओं में शामिल किया जाना चाहिए।
कोइड़ा क्षेत्र में मौजूद जंगल न केवल पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यहां रहने वाले लोगों की संस्कृति और जीवन शैली से भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में जंगलों का लगातार कम होना भविष्य के लिए चिंता का विषय है।
प्रशासन और संबंधित विभागों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती खनिज संसाधनों के उपयोग और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बीच संतुलन कायम करना है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो कोइड़ा की पहचान रहे घने जंगल और जैव विविधता को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
खनन से आर्थिक विकास को गति मिल सकती है, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर होने वाला विकास लंबे समय में कई समस्याएं पैदा कर सकता है। इसलिए जरूरी है कि कोइड़ा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में विकास योजनाओं के साथ-साथ वन संरक्षण को भी प्राथमिकता दी जाए।





