
सुंदरगढ़/बुरला। ओड़िया साहित्य जगत को सोमवार को गहरा आघात लगा। ओड़िया साहित्य के दिग्गज साहित्यकार और ओडिशा साहित्य अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष गिरी दंडसेना का निधन हो गया। उन्होंने बुरला स्थित एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान सोमवार सुबह करीब 8 बजे अंतिम सांस ली। वह 77 वर्ष के थे। उनके निधन की खबर सामने आते ही साहित्य जगत और उनके प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई।
गिरी दंडसेना लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे थे और काफी समय से बिस्तर पर थे। पिछले कुछ दिनों में उनकी तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ गई थी। करीब पांच दिन पहले स्वास्थ्य स्थिति गंभीर होने पर परिजनों ने उन्हें बुरला के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया था। डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा था, लेकिन सोमवार सुबह उनका निधन हो गया।
साहित्य के क्षेत्र में रहा महत्वपूर्ण योगदान
गिरी दंडसेना ने अपनी लेखनी के माध्यम से ओड़िया साहित्य को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं में रचनाएं कीं और अपनी विशिष्ट शैली के कारण पाठकों के बीच अलग पहचान बनाई। उनकी रचनाओं में स्थानीय इतिहास, समाज, संस्कृति और जीवन के विविध पहलुओं की झलक देखने को मिलती है।
दंडसेना की साहित्यिक यात्रा केवल रचनाओं तक सीमित नहीं रही। उन्होंने साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े रहकर भी ओड़िया भाषा और साहित्य के विकास में योगदान दिया। ओडिशा साहित्य अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष के रूप में उन्होंने साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में भूमिका निभाई।
उनका निधन ओड़िया साहित्य के लिए एक ऐसी क्षति माना जा रहा है, जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी। साहित्य जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि दंडसेना ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज और क्षेत्र की स्मृतियों को शब्दों में सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण काम किया।
‘सुंदरगढ़ इतिहास’ ने दिलाई विशेष पहचान
गिरी दंडसेना की चर्चित कृतियों में ‘सुंदरगढ़ इतिहास’ का विशेष स्थान है। इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने सुंदरगढ़ क्षेत्र के इतिहास, विरासत और सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को विस्तार से सामने रखने का प्रयास किया। स्थानीय इतिहास और विरासत से जुड़े विषयों पर उनकी पकड़ ने इस कृति को विशेष महत्व दिलाया।
‘सुंदरगढ़ इतिहास’ के जरिए दंडसेना ने क्षेत्र के अतीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया। सुंदरगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को साहित्यिक रूप में दर्ज करने के कारण इस कृति को व्यापक सराहना मिली।
उनकी यह रचना केवल साहित्यिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं मानी जाती, बल्कि क्षेत्र के इतिहास और विरासत को समझने वाले पाठकों के लिए भी उपयोगी रही। दंडसेना ने स्थानीय विषयों को अपनी लेखनी में जगह देकर साहित्य और समाज के बीच मजबूत संबंध स्थापित किया।
कई महत्वपूर्ण कृतियां प्रकाशित
गिरी दंडसेना की प्रकाशित रचनाओं में ‘कालसूत्र’, ‘ओडिशी ओडिशी’, ‘भूमिगर्भ’, ‘रास्ताकडारे जीवन’ और ‘सुंदरगढ़ इतिहास’ प्रमुख हैं। इन कृतियों के जरिए उन्होंने ओड़िया साहित्य में अपनी अलग पहचान बनाई।
उनकी रचनाओं में जीवन के विविध अनुभवों के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकार भी दिखाई देते हैं। उन्होंने अपने आसपास के समाज और परिवेश को साहित्य का विषय बनाया और उसे प्रभावशाली तरीके से पाठकों तक पहुंचाया।
दंडसेना की लेखनी में क्षेत्रीय जीवन और उसकी विशेषताओं को प्रमुखता मिली। यही वजह है कि उनकी रचनाएं स्थानीय पाठकों के बीच लोकप्रिय रहीं और साहित्यिक क्षेत्र में भी उन्हें सम्मान मिला।
लंबे समय से थे बीमार
परिजनों के अनुसार, गिरी दंडसेना लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। बीमारी के कारण उनकी शारीरिक स्थिति कमजोर हो गई थी और वह लंबे समय से बिस्तर पर थे। पांच दिन पहले उनकी तबीयत अचानक ज्यादा खराब हुई, जिसके बाद उन्हें तत्काल बुरला के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया।
अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था, लेकिन चिकित्सकीय प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। सोमवार सुबह करीब 8 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना मिलने के बाद साहित्य जगत से जुड़े लोगों, शुभचिंतकों और परिचितों ने शोक व्यक्त किया।
साहित्य जगत में शोक की लहर
गिरी दंडसेना के निधन से ओडिशा के साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में शोक का माहौल है। साहित्यकारों और उनके प्रशंसकों ने उनके निधन को ओड़िया साहित्य के लिए बड़ी क्षति बताया है। लोगों का कहना है कि उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से ओड़िया भाषा और साहित्य को समृद्ध किया और स्थानीय इतिहास तथा संस्कृति को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उनके निधन से एक ऐसे साहित्यकार का जीवन-यात्रा समाप्त हो गई, जिसने अपनी लेखनी को समाज और अपनी मिट्टी से जोड़े रखा। विशेष रूप से सुंदरगढ़ के इतिहास और विरासत को साहित्यिक रूप में दर्ज करने के उनके प्रयास को लंबे समय तक याद किया जाएगा।
जन्म से साहित्य तक का सफर
गिरी दंडसेना का जन्म 29 दिसंबर 1949 को हुआ था। जीवन के लंबे सफर में उन्होंने साहित्य को अपना प्रमुख माध्यम बनाया। वर्षों तक लेखन और साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े रहने के बाद उन्होंने ओड़िया साहित्य में अपनी अलग पहचान स्थापित की।
उनकी रचनाओं में अपने समय के समाज की तस्वीर और क्षेत्रीय जीवन की संवेदनाएं दिखाई देती हैं। उन्होंने इतिहास, संस्कृति और सामाजिक जीवन को साहित्य के साथ जोड़कर पाठकों तक पहुंचाया। इसी वजह से उनका साहित्य आने वाली पीढ़ियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाएगा।
गिरी दंडसेना का निधन केवल एक साहित्यकार का निधन नहीं है, बल्कि ओड़िया साहित्य की एक महत्वपूर्ण आवाज का मौन हो जाना है। उनकी पुस्तकों और साहित्यिक योगदान के जरिए उनकी स्मृतियां लंबे समय तक जीवित रहेंगी। ‘सुंदरगढ़ इतिहास’ जैसी कृति विशेष रूप से उनके साहित्यिक योगदान की याद दिलाती रहेगी। सोमवार को उनके निधन से साहित्य जगत ने एक अनुभवी रचनाकार और साहित्यिक व्यक्तित्व को खो दिया।





