
भुवनेश्वर। ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर स्थित उत्कल विश्वविद्यालय में शुक्रवार को ‘अर्थ अगेन कॉन्फ्रेंस 2026’, जिसे ‘पुनश्च पृथ्वी’ के नाम से भी जाना जाता है, के तीसरे संस्करण की शुरुआत हुई। तीन दिवसीय इस सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक चर्चा के लिए विशेषज्ञ, पर्यावरणविद, शिक्षाविद और छात्र एक मंच पर जुटे। सम्मेलन के दौरान पर्यावरणीय चुनौतियों और उनसे निपटने के लिए जरूरी उपायों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।
सम्मेलन का उद्घाटन ओडिशा के राज्यपाल डॉ. हरि बाबू कम्भमपति ने उत्कल विश्वविद्यालय के सभागार में किया। उद्घाटन सत्र में राज्य के ओडिया भाषा, साहित्य और संस्कृति मंत्री सूर्यवंशी सूरज, उत्कल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. चंडी प्रसाद नंदा, ईस्टर्न मीडिया लिमिटेड के चेयरमैन सौम्य रंजन पटनायक और ‘संबाद’ तथा ‘कनक न्यूज’ की संपादक तनया पटनायक सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।
सम्मेलन का उद्देश्य पर्यावरण और आपदा से जुड़े मुद्दों पर विशेषज्ञों के विचारों को एक साझा मंच देना है। इसमें जलवायु परिवर्तन से पैदा हो रही चुनौतियों, पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता और प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने के उपायों पर चर्चा हो रही है। अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ अपने अनुभव और शोध के आधार पर मौजूदा परिस्थितियों का विश्लेषण कर रहे हैं।
तीन दिवसीय कार्यक्रम को उत्कल विश्वविद्यालय के दो अलग-अलग सभागारों में आयोजित किया जा रहा है। सम्मेलन के मुख्य सभागार में पर्यावरण विकास और उससे जुड़े विभिन्न विषयों पर केंद्रित सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। इन सत्रों में पर्यावरण संरक्षण, टिकाऊ विकास और बदलते जलवायु परिदृश्य जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है।
वहीं, महाराजा श्री कृष्ण चंद्र गजपति सभागार में आपदा प्रबंधन और आपदा से पहले की तैयारियों से जुड़े सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। इन सत्रों में प्राकृतिक आपदाओं के दौरान प्रभावी प्रतिक्रिया, तैयारी की व्यवस्था और आपदा के बाद राहत एवं पुनर्वास जैसे विषयों पर विचार रखा जा रहा है।
ओडिशा प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील राज्यों में शामिल है। राज्य में समय-समय पर चक्रवात, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का असर देखने को मिलता रहा है। ऐसे में आपदा प्रबंधन, समय रहते तैयारी और स्थानीय स्तर पर मजबूत प्रतिक्रिया तंत्र को लेकर चर्चा राज्य के संदर्भ में विशेष महत्व रखती है।
सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन को लेकर भी व्यापक विमर्श किया जा रहा है। जलवायु में हो रहे बदलावों का असर मौसम के स्वरूप, तापमान और प्राकृतिक आपदाओं की परिस्थितियों पर पड़ रहा है। विशेषज्ञ इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि विकास की जरूरतों को पूरा करने के साथ पर्यावरणीय संतुलन किस तरह बनाए रखा जाए।
पर्यावरणविदों और शिक्षाविदों के लिए यह सम्मेलन अपने अनुभव साझा करने का अवसर भी उपलब्ध करा रहा है। विभिन्न क्षेत्रों में किए जा रहे शोध, स्थानीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की पहल और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग से जुड़े विचारों पर चर्चा की जा रही है। छात्रों को भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया है, जिससे उन्हें पर्यावरण और आपदा प्रबंधन के व्यावहारिक पक्षों को समझने का अवसर मिल रहा है।
आयोजकों के अनुसार, सम्मेलन का फोकस केवल समस्याओं की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके संभावित समाधान पर भी विचार करना है। पर्यावरण संरक्षण के लिए नीतियों, सामुदायिक भागीदारी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की भूमिका पर चर्चा की जा रही है। इसके साथ ही आपदा के जोखिम को कम करने के लिए बेहतर तैयारी और समन्वय की जरूरत पर भी जोर दिया जा रहा है।
उद्घाटन सत्र में मौजूद वक्ताओं ने पर्यावरण से जुड़े विषयों को समाज के व्यापक हित से जोड़कर देखने की आवश्यकता बताई। बदलते समय में जलवायु और पर्यावरण से संबंधित मुद्दे केवल विशेषज्ञों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आम लोगों के जीवन, कृषि, जल संसाधनों और स्वास्थ्य पर भी उनका असर पड़ सकता है। इसलिए इस क्षेत्र में जागरूकता और सामूहिक भागीदारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सम्मेलन का एक अहम पक्ष यह भी है कि इसमें युवा और विद्यार्थी सक्रिय रूप से शामिल हैं। विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित होने के कारण छात्रों को विभिन्न विशेषज्ञों को सुनने और पर्यावरण तथा आपदा प्रबंधन से जुड़े प्रश्नों पर संवाद करने का अवसर मिल रहा है। इससे शैक्षणिक संस्थानों में पर्यावरणीय विषयों पर जागरूकता बढ़ाने की दिशा में मदद मिल सकती है।
मुख्य सभागार में चल रहे पर्यावरण केंद्रित सत्रों में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन से जुड़े विषयों पर विचार किया जा रहा है। टिकाऊ विकास, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और पर्यावरणीय दबाव को कम करने जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में हैं। विशेषज्ञ बदलती परिस्थितियों के अनुसार नई रणनीतियों की जरूरत पर भी अपने विचार साझा कर रहे हैं।
दूसरे सभागार में चल रहे आपदा प्रबंधन से जुड़े सत्रों में जोखिम कम करने और तैयारियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। किसी आपदा की स्थिति में प्रशासन, स्थानीय समुदाय, बचाव एजेंसियों और अन्य संबंधित संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय किस तरह स्थापित किया जा सकता है, इस पर चर्चा हो रही है।
प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते जोखिम के बीच शुरुआती चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित बुनियादी ढांचा और प्रशिक्षित मानव संसाधन की जरूरत को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सम्मेलन में ऐसे मुद्दों पर विशेषज्ञों के अनुभव और विचार सामने आ रहे हैं। आपदा के बाद केवल राहत पहुंचाने के बजाय जोखिम को पहले से कम करने के उपायों पर भी चर्चा की जा रही है।
‘अर्थ अगेन कॉन्फ्रेंस’ के तीसरे संस्करण का आयोजन ऐसे समय हो रहा है जब दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट को लेकर बहस तेज है। तापमान में बदलाव, मौसम की अनिश्चितता और प्राकृतिक आपदाओं की चुनौती के बीच स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान खोजने की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही है।
ओडिशा के संदर्भ में भी यह सम्मेलन महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य की भौगोलिक स्थिति और तटीय क्षेत्र होने के कारण यहां आपदा प्रबंधन का विशेष महत्व है। चक्रवात और बाढ़ जैसी घटनाओं से निपटने के अनुभवों को साझा करना तथा भविष्य की तैयारी को मजबूत करना सम्मेलन के आपदा प्रबंधन सत्रों का एक प्रमुख विषय है।
विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका भी इस आयोजन में महत्वपूर्ण रही। कुलपति प्रो. चंडी प्रसाद नंदा की मौजूदगी में आयोजित सम्मेलन में अकादमिक जगत और विशेषज्ञों के बीच संवाद का अवसर तैयार हुआ है। छात्रों और शोधार्थियों को पर्यावरणीय चुनौतियों से जुड़े विभिन्न पहलुओं को करीब से समझने का मौका मिल रहा है।
ईस्टर्न मीडिया लिमिटेड के चेयरमैन सौम्य रंजन पटनायक और ‘संबाद’ तथा ‘कनक न्यूज’ की संपादक तनया पटनायक की मौजूदगी से सम्मेलन में मीडिया और पर्यावरण संबंधी संवाद का पक्ष भी जुड़ा। पर्यावरण और आपदा से जुड़े मुद्दों को व्यापक समाज तक पहुंचाने में मीडिया की भूमिका पर भी चर्चा के अवसर बन रहे हैं।
तीन दिवसीय सम्मेलन के दौरान विभिन्न सत्रों में विशेषज्ञ अपने विचार, अनुभव और संभावित समाधान प्रस्तुत करेंगे। इनमें पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, आपदा जोखिम कम करने और तैयारियों से जुड़े अलग-अलग विषयों को शामिल किया गया है। छात्रों और अन्य प्रतिभागियों के लिए संवाद और प्रश्नोत्तर के अवसर भी कार्यक्रम का हिस्सा हैं।
सम्मेलन का उद्देश्य पर्यावरण और आपदा प्रबंधन को अलग-अलग विषयों के बजाय एक-दूसरे से जुड़े मुद्दों के रूप में समझने की दिशा में भी काम करना है। जलवायु परिवर्तन का असर आपदाओं के जोखिम पर पड़ सकता है और पर्यावरणीय क्षति प्राकृतिक संसाधनों तथा समुदायों की संवेदनशीलता बढ़ा सकती है। इसलिए दोनों क्षेत्रों में समन्वित रणनीति की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।
‘अर्थ अगेन कॉन्फ्रेंस 2026’ का तीसरा संस्करण शुक्रवार से शुरू होकर अगले दो दिनों तक जारी रहेगा। सम्मेलन में देश के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और पर्यावरणविदों की भागीदारी से विषयों पर व्यापक चर्चा की जा रही है।
उद्घाटन के साथ शुरू हुए इस सम्मेलन में पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन को लेकर विचारों का आदान-प्रदान हो रहा है। उत्कल विश्वविद्यालय के दो सभागारों में चल रहे सत्रों के जरिए पर्यावरण विकास और आपदा तैयारियों को अलग-अलग केंद्रों पर चर्चा का विषय बनाया गया है।
फिलहाल भुवनेश्वर में आयोजित ‘अर्थ अगेन कॉन्फ्रेंस 2026’ पर्यावरण और आपदा प्रबंधन के मुद्दों पर विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और युवाओं के बीच संवाद का प्रमुख मंच बना हुआ है। आने वाले दो दिनों में होने वाले सत्रों से इन विषयों पर नई जानकारी, अनुभव और समाधान संबंधी विचार सामने आने की उम्मीद है।





