ओडिशा

नॉर्वे दौरे में PM Modi ने महारानी सोन्या को भेंट किया ओडिशा का ‘ताला पट्टचित्र’

Kavita2
21 May 2026 1:07 PM IST
नॉर्वे दौरे में PM Modi ने महारानी सोन्या को भेंट किया ओडिशा का ‘ताला पट्टचित्र’
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Odisha ओडिशा: प्रधानमंत्री Narendra Modi ने अपनी नॉर्वे की राजनयिक यात्रा के दौरान महारानी सोन्या को ओडिशा की पारंपरिक कला ‘ताला पट्टचित्र’ भेंट कर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया। इस अवसर पर उन्होंने भारतीय हस्तकला की सदियों पुरानी परंपरा और उसकी विशिष्ट पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित किया।

यह विशेष उपहार न केवल एक कलाकृति है, बल्कि ओडिशा की प्राचीन शिल्प परंपरा का जीवंत उदाहरण भी है, जो भारत की सांस्कृतिक विविधता और कलात्मक उत्कृष्टता को दर्शाता है। इस भेंट के माध्यम से भारत की पारंपरिक कला को वैश्विक पहचान दिलाने का प्रयास किया गया।

‘ताला पट्टचित्र’ या ‘तालपत्र कला’ ओडिशा की सबसे प्राचीन और बारीक हस्तकलाओं में से एक मानी जाती है। यह कला सामान्य पट्टचित्र चित्रों से अलग होती है, जो कपड़े पर बनाई जाती हैं। इसके विपरीत, ताला पट्टचित्र को विशेष रूप से तैयार किए गए ताड़ के पत्तों पर उकेरा जाता है।

इस कला के लिए उपयोग किए जाने वाले पत्ते मुख्य रूप से ‘पामिरा’ (Palmyra) वृक्ष से प्राप्त किए जाते हैं। इन पत्तों को विशेष प्रक्रिया से तैयार किया जाता है ताकि उन पर बारीक नक्काशी की जा सके। इसके बाद कलाकार अत्यंत धैर्य और कौशल के साथ उन पर पौराणिक कथाओं, धार्मिक प्रसंगों और पारंपरिक कहानियों को उकेरते हैं।

इस कला की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सूक्ष्मता और सटीकता है। हर रेखा और हर चित्र अत्यंत बारीकी से बनाया जाता है, जिसमें त्रुटि की कोई गुंजाइश नहीं होती। यही कारण है कि यह कला ओडिशा की सबसे सम्मानित शिल्प परंपराओं में गिनी जाती है।

ताला पट्टचित्र में भारतीय पौराणिक कथाओं, देवी-देवताओं के प्रसंगों और शास्त्रीय कथाओं को दृश्य रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह केवल कला नहीं, बल्कि कहानी कहने का एक पारंपरिक माध्यम भी है, जो पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करता है।

प्रधानमंत्री द्वारा इस कला को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करना भारतीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देने और उसे वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे न केवल ओडिशा की पारंपरिक कला को नई पहचान मिलेगी, बल्कि स्थानीय कारीगरों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

इस तरह की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भारत की ‘विविधता में एकता’ की भावना को और मजबूत करती हैं और दुनिया भर में भारतीय कला और संस्कृति की गहरी छाप छोड़ती हैं।

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