
कटक/भुवनेश्वर: ओडिशा हाई कोर्ट ने उत्कल यूनिवर्सिटी के पोस्ट ग्रेजुएट काउंसिल (PGC) चेयरपर्सन पद से प्रोफेसर डॉ. दुर्गा शंकर पटनायक को हटाने के विश्वविद्यालय के फैसले को सही ठहराया है। अदालत ने इस फैसले को चुनौती देने वाली उनकी रिट याचिका को खारिज कर दिया है।
जस्टिस ए.के. महापात्रा की सिंगल बेंच ने अपने आदेश में कहा कि PGC चेयरपर्सन का पद कोई स्वतंत्र सेवा पद नहीं है, बल्कि यह किसी प्रोफेसर को दी जाने वाली अतिरिक्त प्रशासनिक जिम्मेदारी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस जिम्मेदारी से हटाए जाने का अर्थ प्रोफेसर की मूल सेवा शर्तों में बदलाव नहीं है।
हाई कोर्ट ने कहा कि किसी प्रोफेसर को PGC चेयरपर्सन जैसे प्रशासनिक पद से मुक्त करने से उसकी सैलरी, रैंक, सेवा अधिकार या नौकरी की अन्य सुविधाओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है। इसलिए विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा लिया गया निर्णय सेवा नियमों के विपरीत नहीं माना जा सकता।
मामले के अनुसार, डॉ. दुर्गा शंकर पटनायक उत्कल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे और उन्हें पोस्ट ग्रेजुएट काउंसिल के चेयरपर्सन की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई थी। बाद में विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्हें इस पद से हटा दिया। इस फैसले को उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
अपनी याचिका में डॉ. पटनायक ने विश्वविद्यालय के निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा था कि उन्हें PGC चेयरपर्सन पद से हटाने की प्रक्रिया उचित नहीं थी। उन्होंने अदालत से विश्वविद्यालय के आदेश को रद्द करने और उन्हें पद पर बहाल करने की मांग की थी।
हालांकि, हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद उनकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि विश्वविद्यालय प्रशासन के पास ऐसी अतिरिक्त प्रशासनिक जिम्मेदारियों को बदलने या वापस लेने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि किसी शिक्षक को प्रशासनिक दायित्व देना या उससे मुक्त करना विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि PGC चेयरपर्सन का पद किसी अलग नियुक्ति या स्थायी सेवा पद की श्रेणी में नहीं आता। यह पद प्रोफेसर के मूल पद के साथ जुड़ी अतिरिक्त जिम्मेदारी होती है, जिसे संस्थान की जरूरतों और प्रशासनिक फैसलों के आधार पर बदला जा सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हाई कोर्ट का यह फैसला विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक पदों की प्रकृति को स्पष्ट करता है। अदालत ने यह माना है कि अतिरिक्त जिम्मेदारी वाले पदों पर नियुक्ति और बदलाव विश्वविद्यालय प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, बशर्ते इससे कर्मचारी के मूल सेवा अधिकार प्रभावित न हों।
उत्कल यूनिवर्सिटी राज्य के प्रमुख उच्च शिक्षा संस्थानों में शामिल है और यहां विभिन्न शैक्षणिक तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं के संचालन के लिए अलग-अलग समितियां और परिषदें बनाई गई हैं। PGC भी विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर शिक्षा से जुड़े मामलों के समन्वय और प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन के निर्णय को न्यायिक मंजूरी मिल गई है। अदालत के आदेश से यह भी स्पष्ट हुआ है कि शिक्षकों को दी गई प्रशासनिक जिम्मेदारियां उनके मूल शैक्षणिक पद से अलग होती हैं और उन्हें संस्थागत जरूरतों के अनुसार बदला जा सकता है।
फैसले के बाद अब डॉ. पटनायक के पास आगे की कानूनी प्रक्रिया अपनाने का विकल्प उपलब्ध हो सकता है। हालांकि, फिलहाल हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए विश्वविद्यालय के फैसले को बरकरार रखा है।
यह निर्णय विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक जिम्मेदारियों, शिक्षकों के अधिकारों और संस्थानों की स्वायत्तता से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण आदेश माना जा रहा है।





