
कटक: ओडिशा हाई कोर्ट के जस्टिस आर.के. पटनायक ने मंगलवार को उन याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, जिन्हें BJD की चीफ व्हिप प्रमिला मलिक ने दायर किया था। इन याचिकाओं में ओडिशा विधानसभा के स्पीकर के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें मार्च में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान कथित तौर पर क्रॉस-वोटिंग करने वाले पार्टी के आठ विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग वाली अर्जियों को खारिज कर दिया गया था।
जस्टिस पटनायक ने इन मामलों से खुद को अलग करने का कोई कारण नहीं बताया। अपने संक्षिप्त आदेश में उन्होंने कहा, "मैं इन मामलों की सुनवाई से खुद को अलग करता हूं, इसलिए रजिस्ट्री से अनुरोध है कि वह अगले सप्ताह किसी भी समय चीफ जस्टिस के आदेश से इन्हें किसी अन्य बेंच के समक्ष सूचीबद्ध करे।" यह आदेश आठ में से पांच विधायकों - अरविंद महापात्रा, सौविक बिस्वाल, सनातन महाकुड, चक्रमणि कन्हार और सुबासिनी जेना - से संबंधित याचिकाओं पर दलीलें सुनने के बाद आया। ये पांच विधायक उन लोगों में शामिल हैं जिनके खिलाफ BJD ने दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की मांग की थी।
राज्य की ओर से पेश एडवोकेट जनरल पीतांबर आचार्य ने याचिकाओं की स्वीकार्यता पर आपत्ति जताई। मलिक की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मिलन कानूनगो ने स्पीकर के रुख का विरोध करते हुए दलील दी कि BJD की याचिकाओं को सीधे खारिज करने के बजाय उन्हें प्रक्रियात्मक कमियों को दूर करने का मौका दिया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि आरोपों की जांच किए बिना तकनीकी आधार पर अयोग्यता की अर्जियों को खारिज करना दलबदल विरोधी कानून के मकसद को ही खत्म कर देगा।
स्पीकर ने 19 जून की अधिसूचना में BJD की याचिकाओं को अस्पष्ट, अनिश्चित और बिना सबूत वाला बताया था और कहा था कि वे मेरिट के आधार पर विचार किए जाने के लिए कानूनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती हैं। इन याचिकाओं को 'ओडिशा विधानसभा सदस्य (दलबदल के आधार पर अयोग्यता) नियम, 1987' के नियम 7(2) के तहत खारिज कर दिया गया था।





