
Nagaland नागालैंड : यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा की गई एक नई स्टडी में उत्तर-पूर्व भारत में बढ़ते मिट्टी के कटाव (soil erosion) के खतरे को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की गई है। इस अध्ययन में कहा गया है कि यदि इस समस्या पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह क्षेत्र की कृषि, जल स्रोतों और पर्यावरणीय संतुलन पर गहरा असर डाल सकता है।
यह शोध पीयर-रिव्यूड जर्नल “डिस्कवर जियोसाइंस” में प्रकाशित हुआ है और इसका फोकस असम के गाई नदी बेसिन में स्थित सिजी वाटरशेड पर रखा गया है। इसे पूर्वी हिमालयी क्षेत्र के सबसे अधिक मिट्टी कटाव वाले इलाकों में से एक माना जाता है। अध्ययन में आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए विस्तृत विश्लेषण किया गया है।
शोधकर्ताओं ने जियोग्राफिक इन्फॉर्मेशन सिस्टम (GIS) आधारित मॉडलिंग और रिवाइज्ड यूनिवर्सल सॉइल लॉस इक्वेशन (RUSLE) का इस्तेमाल कर पूरे क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन किया। इस तकनीक की मदद से उन्होंने उन इलाकों की पहचान की जहां मिट्टी का कटाव सबसे अधिक है। साथ ही, उन्होंने यह भी समझने की कोशिश की कि पानी और बारिश के साथ मिट्टी के कण किस तरह एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच रहे हैं।
स्टडी में यह स्पष्ट किया गया है कि उत्तर-पूर्व क्षेत्र में कई प्राकृतिक और मानवीय कारण मिट्टी के कटाव को तेज कर रहे हैं। इनमें खड़ी ढलान, अत्यधिक वर्षा, वनों की कटाई, झूम खेती, खनन गतिविधियां और बुनियादी ढांचे का तेजी से विस्तार प्रमुख कारण हैं। इन कारणों से पहाड़ी क्षेत्रों की नाजुक पारिस्थितिकी प्रणाली पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।
शोध के अनुसार, जिन क्षेत्रों में घने जंगल और हल्की ढलान मौजूद है, वहां मिट्टी का नुकसान अपेक्षाकृत कम पाया गया। इसके विपरीत, खेती योग्य भूमि, बंजर क्षेत्र, सड़क निर्माण और खनन से प्रभावित इलाकों में मिट्टी का कटाव काफी अधिक दर्ज किया गया है। इससे न केवल जमीन की स्थिरता प्रभावित हो रही है, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र भी खतरे में पड़ रहा है।
इस शोध को नागालैंड यूनिवर्सिटी के भूगोल विभाग के एम. एस. रावत, शोध छात्र तुलुमोनी गोगोई और मणिपुर की एशियन इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के प्रदीप कुमार रावत ने मिलकर तैयार किया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि GIS आधारित यह फ्रेमवर्क नीति निर्धारण और पर्यावरण प्रबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण साबित हो सकता है।
अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि मिट्टी कटाव के हॉटस्पॉट क्षेत्रों की नियमित निगरानी की जाए और वहां संरक्षण उपायों को प्राथमिकता दी जाए। साथ ही, वनीकरण, सतत कृषि पद्धतियों और नियंत्रित विकास कार्यों को बढ़ावा देने की जरूरत बताई गई है।
शोध में यह भी कहा गया है कि अगर वर्तमान स्थिति में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में उत्तर-पूर्व भारत में भूमि क्षरण और पर्यावरणीय असंतुलन और अधिक गंभीर हो सकता है, जिसका सीधा असर लोगों की आजीविका और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ेगा।





