
Nagaland नागालैंड: नागालैंड के किफिरे जिले में भारत-म्यांमार सीमा के पास पैंगोलिन के शिकार और तस्करी को लेकर गंभीर चिंता बनी हुई है। यह इलाका लंबे समय से वाइल्डलाइफ तस्करी का एक अहम मार्ग माना जाता है, जहां पैंगोलिन का शिकार पहले सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण और अब व्यावसायिक लाभ के लिए किया जाता रहा है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले पैंगोलिन को लेकर कई तरह की पारंपरिक मान्यताएं प्रचलित थीं। अमहाटोर गांव के 61 वर्षीय एल. किपिटोंग संगतम बताते हैं कि उनके पूर्वज मानते थे कि यदि पैंगोलिन घर में प्रवेश कर जाए तो यह अशुभ संकेत या श्राप माना जाता था। इसी कारण पहले लोग इसे पकड़कर मार देते थे और कभी-कभी इसके बिल से निकालकर भी शिकार किया जाता था।
हालांकि अब स्थिति बदल रही है। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कार्यकर्ता और संगठन इस दुर्लभ स्तनपायी को बचाने के लिए स्थानीय ग्राम परिषदों और पारंपरिक न्याय व्यवस्था की मदद ले रहे हैं। भारत में वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत पैंगोलिन का शिकार पूरी तरह प्रतिबंधित है, लेकिन इसके बावजूद अवैध शिकार और तस्करी पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं हो सका है।
इसी को देखते हुए कंज़र्वेशनिस्ट अब स्थानीय जनजातीय संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, ताकि समुदाय स्तर पर सख्त नियम लागू किए जा सकें। इन प्रयासों का उद्देश्य पारंपरिक सामाजिक संरचना का उपयोग कर संरक्षण को मजबूत करना है।
इस दिशा में इस वर्ष एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया, जब यूनाइटेड संगतम लिखुम पुमजी (USLP), जो संगतम नागा समुदाय की प्रमुख संस्था है, ने किफिरे जिले के 42 गांवों में पैंगोलिन के शिकार पर समुदाय आधारित प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव पारित किया। संगतम नागा समुदाय मुख्य रूप से किफिरे और तुएनसांग जिलों में निवास करता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत-म्यांमार सीमा क्षेत्र में पाए जाने वाले चीनी पैंगोलिन पर बढ़ता खतरा चिंता का विषय है, क्योंकि यह प्रजाति पहले से ही अत्यधिक संकटग्रस्त श्रेणी में आती है। स्थानीय उपयोग और अंतरराष्ट्रीय तस्करी दोनों ही इसके अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं।
स्थानीय और संरक्षण संगठनों के संयुक्त प्रयासों से उम्मीद जताई जा रही है कि समुदाय-आधारित नियमों के जरिए पैंगोलिन की आबादी को बचाने में मदद मिलेगी और अवैध शिकार पर रोक लगाई जा सकेगी।





