मिज़ोरम
पूर्वोत्तर की समृद्ध धरोहर सहेजने के लिए युवाओं की भागीदारी ज़रूरी
Tara Tandi
8 Oct 2026 6:03 PM IST

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मिज़ोरम: पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग मंत्री लालनिलावमा ने 8 अक्टूबर को कहा कि तेज़ी से हो रहे तकनीकी और सामाजिक बदलावों के साथ तालमेल बिठाते हुए पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखना ज़रूरी है।
आइजोल में "पूर्वोत्तर भारत में युवा और संस्कृति: मेल और नज़रिए" विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का उद्घाटन करते हुए लालनिलावमा ने कहा कि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता, मूल निवासी समुदाय, भाषाएँ, परंपराएँ, रचनात्मकता और समुदाय की मज़बूत भावना इसकी सबसे बड़ी ताकत हैं।
उन्होंने कहा कि ये ताकतें देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में अहम योगदान दे सकती हैं।
मंत्री ने कहा कि गवर्नमेंट आइजोल नॉर्थ कॉलेज (GANC) और क्राइस्ट यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह सेमिनार ऐसे समय में हो रहा है जब युवा संगीत, फैशन, साहित्य, सोशल मीडिया और सामाजिक भागीदारी के ज़रिए सांस्कृतिक तौर-तरीकों को तेज़ी से आकार दे रहे हैं।
लालनिलावमा ने सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि ये तकनीकें शिक्षा, रचनात्मकता और रिसर्च के अवसर तो देती हैं, लेकिन गलत जानकारी और डिजिटल रूप से बदले गए कंटेंट के ज़रिए जोखिम भी पैदा करती हैं।
उन्होंने युवाओं को नई तकनीकों का ज़िम्मेदारी और समझदारी से इस्तेमाल करने के लिए ज़रूरी ज्ञान और कौशल से लैस करने का आह्वान किया।
मंत्री ने उम्मीद जताई कि यह सेमिनार अलग-अलग राज्यों के रिसर्चर्स, शिक्षाविदों और प्रतिभागियों को विचारों के आदान-प्रदान, एकेडमिक नेटवर्क बनाने और भविष्य में मिलकर काम करने के मौकों को तलाशने का अवसर देगा।
'आज युवा समाज को आकार दे रहे हैं'
असम की गिरिजानांदा चौधरी यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो. कंदर्पा दास ने कहा कि युवाओं को सिर्फ़ देश का भविष्य नहीं, बल्कि आज के समाज को आकार देने में सक्रिय भागीदार के तौर पर देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता एक जीवित विरासत है, जिसे नई पीढ़ियों को तेज़ी से हो रहे तकनीकी और सामाजिक बदलावों के बीच नए नज़रिए से समझने और बनाए रखने की ज़रूरत है।
दास ने शिक्षण संस्थानों से आलोचनात्मक सोच, सांस्कृतिक समझ और सामाजिक ज़िम्मेदारी को बढ़ावा देने का आह्वान किया, ताकि युवा अपने समुदायों से जुड़े रहते हुए वैश्विक स्तर की क्षमताएँ विकसित कर सकें।
लेखिका और स्तंभकार मित्रा फुकन ने भी नवाचार और आज की सच्चाइयों को अपनाते हुए पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक विरासत को बचाने और उसे नई ऊर्जा देने में युवाओं की भूमिका पर ज़ोर दिया। दो दिन के इस सेमिनार में अलग-अलग राज्यों से रिसर्चर, एकेडमिक्स और प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं। वे युवाओं की पहचान, परंपरा और वैश्वीकरण, डिजिटल मीडिया, सामाजिक-आर्थिक और मनोवैज्ञानिक चुनौतियां, नागरिक भागीदारी, सांस्कृतिक इनोवेशन और समावेशी युवा विकास जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगे।
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