मेघालय

माल्टा में मिले तीन गारो सैनिकों के मकबरे

Kavita2
26 Sept 2026 9:49 AM IST
माल्टा में मिले तीन गारो सैनिकों के मकबरे
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शिलांग। मेघालय के विधायकों और अधिकारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने माल्टा के पिएटा मिलिट्री कब्रिस्तान का दौरा कर प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सेवा देने वाले गारो समुदाय के लोगों को श्रद्धांजलि दी। मेघालय विधानसभा के अध्यक्ष थॉमस ए. संगमा के नेतृत्व में पहुंचे दल को इस दौरान 69वीं गारो लेबर कंपनी से जुड़े तीन और लोगों की कब्रों की जानकारी मिली। इससे प्रथम विश्व युद्ध में गारो हिल्स के लोगों की भूमिका से जुड़े इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है।

प्रतिनिधिमंडल ने पिएटा में कॉमनवेल्थ द्वारा देखरेख किए जाने वाले सैन्य कब्रिस्तान में दफन गारो हिल्स के चार लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की। अब तक इस कब्रिस्तान में खेव मारक की कब्र को ही 69वीं गारो लेबर कंपनी से जुड़े किसी गारो सदस्य की एकमात्र ज्ञात कब्र माना जाता था। खेव मारक की मृत्यु 15 जून 1918 को हुई थी।

ताजा दौरे के दौरान तीन अन्य कब्रों की पहचान सामने आने के बाद यह संख्या बढ़कर चार हो गई है। इससे यह जानकारी और स्पष्ट हुई है कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गारो हिल्स से गए लोगों ने भारत से हजारों किलोमीटर दूर यूरोप और भूमध्यसागरीय क्षेत्र में भी अपनी सेवाएं दी थीं।

69वीं गारो लेबर कंपनी प्रथम विश्व युद्ध के समय गठित श्रम इकाइयों में शामिल थी। उस दौर में ब्रिटिश भारतीय क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में लोगों को लेबर कॉर्प्स और सहायक इकाइयों में भर्ती किया गया था। इनका काम सीधे युद्ध लड़ने वाली टुकड़ियों के पीछे आवश्यक व्यवस्थाओं को संभालना था। इसमें सामान और गोला-बारूद पहुंचाने, सैन्य प्रतिष्ठानों से जुड़े निर्माण कार्य, सड़क और अन्य बुनियादी ढांचे के रखरखाव तथा विभिन्न लॉजिस्टिक कार्य शामिल थे।

मेघालय के गारो हिल्स से भी युवाओं ने इन इकाइयों में हिस्सा लिया था। वे अपने घरों से बहुत दूर ऐसे क्षेत्रों में पहुंचे, जहां युद्ध के कारण परिस्थितियां बेहद कठिन थीं। बीमारी, खराब मौसम और कठिन कार्य परिस्थितियों के कारण कई लोगों की विदेशों में ही मृत्यु हो गई और उन्हें वहीं सैन्य कब्रिस्तानों में दफनाया गया।

माल्टा के सैन्य कब्रिस्तान में मिले तीन और गारो सैनिकों के मकबरे, प्रथम विश्व युद्ध से जुड़ा इतिहास आया सामने

पिएटा मिलिट्री कब्रिस्तान भी प्रथम विश्व युद्ध के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। माल्टा की रणनीतिक स्थिति के कारण युद्ध के दौरान यहां सैन्य अस्पताल और चिकित्सा सुविधाएं स्थापित की गई थीं। युद्ध के विभिन्न मोर्चों से घायल और बीमार सैनिकों तथा सहायक कर्मियों को उपचार के लिए माल्टा लाया जाता था। जिन लोगों की उपचार के दौरान मृत्यु हुई, उनमें से कई को यहां के सैन्य कब्रिस्तानों में दफनाया गया।

मेघालय के प्रतिनिधिमंडल के लिए यह यात्रा केवल एक औपचारिक दौरा नहीं रही, बल्कि राज्य के इतिहास से जुड़ी भूली-बिसरी कड़ियों को खोजने का अवसर भी बनी। अब तक खेव मारक का नाम इस कब्रिस्तान में गारो समुदाय की मौजूदगी के प्रमुख प्रमाण के रूप में जाना जाता था। तीन और कब्रों की पहचान से गारो लेबर कंपनी के सदस्यों की विदेश में सेवा और बलिदान के बारे में नई जानकारी सामने आई है।

प्रतिनिधिमंडल ने चारों कब्रों पर जाकर श्रद्धांजलि अर्पित की और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उनके योगदान को याद किया। विधानसभा अध्यक्ष थॉमस ए. संगमा के नेतृत्व वाले दल में शामिल विधायकों और अधिकारियों ने इसे गारो समुदाय और मेघालय के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण अवसर माना।

प्रथम विश्व युद्ध 1914 से 1918 के बीच लड़ा गया था। ब्रिटिश भारत से बड़ी संख्या में सैनिकों के साथ श्रमिक और सहायक कर्मचारी भी अलग-अलग युद्ध क्षेत्रों में भेजे गए थे। सैनिकों की भूमिका का उल्लेख इतिहास में अपेक्षाकृत अधिक मिलता है, लेकिन लेबर कंपनियों में सेवा देने वाले लोगों की कहानियां लंबे समय तक सीमित दस्तावेजों और सैन्य अभिलेखों में ही दर्ज रहीं।

गारो लेबर कंपनी से जुड़े लोगों की भूमिका भी इसी इतिहास का हिस्सा है। इन लोगों ने सीधे युद्ध के मोर्चे पर हथियार उठाने के बजाय सैन्य अभियानों को जारी रखने के लिए जरूरी लॉजिस्टिक और श्रम संबंधी जिम्मेदारियां निभाईं। युद्ध के समय ऐसी इकाइयों की भूमिका महत्वपूर्ण थी क्योंकि सैनिकों तक आवश्यक सामान पहुंचाने से लेकर बुनियादी ढांचे को बनाए रखने तक कई जिम्मेदारियां उनके कंधों पर होती थीं।

पिएटा में तीन और गारो सदस्यों की कब्रों की पहचान होने से अब उनके व्यक्तिगत और पारिवारिक इतिहास की खोज की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं। सैन्य अभिलेखों, कॉमनवेल्थ के रिकॉर्ड और स्थानीय दस्तावेजों के आधार पर इन लोगों के बारे में आगे और जानकारी जुटाई जा सकती है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि वे गारो हिल्स के किन क्षेत्रों से गए थे और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उनकी तैनाती तथा सेवा का स्वरूप क्या था।

इस खोज का महत्व मेघालय के स्थानीय इतिहास के लिए भी है। गारो समुदाय की नई पीढ़ी के लिए प्रथम विश्व युद्ध की घटनाएं भौगोलिक और समय की दृष्टि से बहुत दूर की लग सकती हैं, लेकिन माल्टा में मौजूद ये कब्रें उस दौर से गारो हिल्स के सीधे संबंध का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।

प्रतिनिधिमंडल की यात्रा से यह विषय एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा में आया है कि प्रथम विश्व युद्ध में पूर्वोत्तर भारत के समुदायों का योगदान केवल सैन्य सेवा तक सीमित नहीं था। श्रम और सहायक इकाइयों में शामिल लोगों ने भी युद्धकालीन व्यवस्थाओं को बनाए रखने में भूमिका निभाई थी।

अब तीन अतिरिक्त कब्रों की पहचान के बाद पिएटा मिलिट्री कब्रिस्तान में 69वीं गारो लेबर कंपनी से जुड़े ज्ञात गारो सदस्यों की संख्या चार हो गई है। खेव मारक के साथ तीन अन्य लोगों की मौजूदगी सामने आने से करीब एक सदी पुराने इतिहास की एक नई कड़ी जुड़ी है।

मेघालय के प्रतिनिधिमंडल द्वारा चारों लोगों को दी गई श्रद्धांजलि उनके योगदान को फिर से याद करने का अवसर बनी। साथ ही इस खोज ने गारो हिल्स और प्रथम विश्व युद्ध के बीच मौजूद ऐतिहासिक संबंधों पर आगे शोध और दस्तावेजीकरण की संभावनाओं को भी मजबूत किया है।

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