मेघालय

सैटेलाइट अध्ययन: मेघालय की बंजर जमीन फिर से होगी आबाद

Tara Tandi
20 Oct 2026 11:55 AM IST
सैटेलाइट अध्ययन: मेघालय की बंजर जमीन फिर से होगी आबाद
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मेघालय: 'जर्नल ऑफ जियोग्राफी, एनवायरनमेंट एंड अर्थ साइंस इंटरनेशनल' में इस महीने की शुरुआत में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, सैटेलाइट इमेजरी और जियोग्राफिक इंफॉर्मेशन सिस्टम (GIS) तकनीक की मदद से मेघालय में 3,40,673.36 हेक्टेयर ऐसी बंजर भूमि की पहचान की गई है, जिसे खेती के लायक बनाया जा सकता है। यह राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 15.2 प्रतिशत हिस्सा है।
अध्ययन में ऐसे क्षेत्रों की पहचान की गई है, जिन्हें कृषि के लिए तैयार करने और भूमि के टिकाऊ उपयोग की योजना बनाने के लिए परखा जा सकता है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी चेतावनी दी है कि इन क्षेत्रों में खेती की संभावना तय करने से पहले, ज़मीनी स्तर पर इनकी जांच और विस्तृत मूल्यांकन करना ज़रूरी होगा।
पहचाने गए कुल क्षेत्र में सबसे बड़ा हिस्सा 'विरल झाड़ीदार भूमि' (sparse scrubland) का है, जो 2,06,595.18 हेक्टेयर (कुल क्षेत्र का 60.64 प्रतिशत) में फैला है। इसके बाद 'घनी झाड़ीदार भूमि' (dense scrubland) का नंबर आता है, जो 99,488.89 हेक्टेयर में है, जबकि 'शिफ्टिंग कल्टीवेशन' (झूम खेती) वाले क्षेत्र 34,331.34 हेक्टेयर में फैले हैं। घास के मैदान और पशु चराने वाली ज़मीनें 257.94 हेक्टेयर में हैं, जो कुल क्षेत्र का 0.08 प्रतिशत है।
यह शोध रोनक मीणा, चंदन गोस्वामी, सी.पी. सुरेश और अकमाल हक ने किया है। ये सभी तुरा स्थित नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी के बागवानी विभाग और उमियम स्थित नॉर्थ ईस्टर्न स्पेस एप्लीकेशन्स सेंटर से जुड़े हैं।
शोधकर्ताओं ने 2025-26 के लिए LISS-IV सेंसर से प्राप्त मल्टीस्पेक्ट्रल सैटेलाइट इमेजरी का इस्तेमाल किया। इसके ज़रिए उन्होंने पहचानी गई ज़मीन को चार श्रेणियों में बांटा: घनी झाड़ीदार भूमि, विरल झाड़ीदार भूमि, घास के मैदान और पशु चराने वाली ज़मीनें, तथा शिफ्टिंग कल्टीवेशन वाले क्षेत्र।
उनके मूल्यांकन के आधार पर, 'विरल झाड़ीदार भूमि' को कृषि के लिए तैयार करने की प्राथमिकता के मामले में 100 में से 95 का सबसे अधिक स्कोर मिला। 'घनी झाड़ीदार भूमि' को 80, 'शिफ्टिंग कल्टीवेशन' वाले क्षेत्रों को 60, और घास के मैदानों व पशु चराने वाली ज़मीनों को 25 का स्कोर दिया गया।
शोधकर्ताओं का कहना है कि ये नतीजे मेघालय में भूमि उपयोग की योजना बनाने, संसाधनों के प्रबंधन और कृषि विकास के लिए एक आधार (बेसलाइन) का काम कर सकते हैं। हालांकि, उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस वर्गीकरण का मतलब यह नहीं है कि नक्शे में दिखाए गए सभी क्षेत्र तुरंत खेती के लिए उपयुक्त हैं। इस अध्ययन में मिट्टी के गुण, ढलान, पानी की उपलब्धता, पहुंच और आर्थिक व्यवहार्यता जैसे कारकों का आकलन नहीं किया गया। शोधकर्ताओं ने कहा कि किसी जगह को सुधारने (reclamation) के लिए विचार करने से पहले, विस्तृत भूमि मूल्यांकन के जरिए इन कारकों की जांच करना जरूरी होगा।
अध्ययन में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि भूमि-उपयोग में बदलाव की योजना बनाते समय, झाड़ीदार वनस्पतियों के पारिस्थितिक कार्यों और 'शिफ्टिंग कल्टीवेशन' (झूम खेती) के आजीविका संबंधी महत्व को ध्यान में रखना चाहिए। इसमें चेतावनी दी गई है कि भूमि सुधार के उपाय बहुत सावधानी से तैयार किए जाने चाहिए, खासकर उन इलाकों में जहां मिट्टी के कटाव (soil erosion) का खतरा अधिक है।
वर्गीकरण मानचित्र (classification map) में 200 संदर्भ नमूनों के आधार पर कुल 86 प्रतिशत सटीकता दर्ज की गई, जिनमें से 172 का सही वर्गीकरण किया गया था।
शोधकर्ताओं ने कहा कि किसी विशिष्ट जगह के कृषि उपयोग के लिए उपयुक्त होने की पुष्टि करने के लिए अतिरिक्त फील्ड सत्यापन (field verification) की आवश्यकता होगी। इस अध्ययन में चिन्हित भूमि का किसी विशेष फसल के लिए आकलन नहीं किया गया और न ही वास्तव में कोई भूमि सुधार कार्य किया गया।
ये निष्कर्ष भूमि का एक प्रारंभिक स्थानिक आकलन (spatial assessment) प्रदान करते हैं, जिस पर आगे और जांच की जा सकती है; इसे खेती के लिए तुरंत उपलब्ध भूमि का कोई पक्का अनुमान नहीं माना जाना चाहिए।
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