
Meghalaya मेघालय: मेघालय के लिए एक अहम शैक्षिक निर्णय में, सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) ने खासी और गारो भाषाओं को अपने भाषा सिलेबस में शामिल कर लिया है। इसके साथ ही बोर्ड से जुड़े स्कूलों में 2026-27 शैक्षणिक सत्र से इन दोनों भाषाओं को ऑप्शनल तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाए जाने का रास्ता साफ हो गया है।
CBSE द्वारा जारी अपडेट के अनुसार, खासी और गारो को OASIS पोर्टल पर उपलब्ध भाषाओं की संशोधित सूची में शामिल किया गया है। यह कदम नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (NCF) के तहत लागू किए गए नए तीन-भाषा फॉर्मेट का हिस्सा है।
इस निर्णय के बाद अब CBSE से संबद्ध स्कूलों में छात्र इन क्षेत्रीय भाषाओं को तीसरी भाषा के विकल्प के रूप में चुन सकेंगे। इससे न केवल मेघालय की स्थानीय भाषाओं को शिक्षा प्रणाली में औपचारिक स्थान मिलेगा, बल्कि क्षेत्रीय संस्कृति और भाषा संरक्षण को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब हाल ही में CBSE के पहले जारी किए गए अपडेटेड भाषा फ्रेमवर्क में खासी और गारो के शामिल न होने को लेकर चिंता जताई गई थी। इस मुद्दे ने मेघालय में शिक्षा जगत और स्थानीय समुदायों के बीच चर्चा को जन्म दिया था।
इसके बाद मेघालय सरकार ने सक्रिय भूमिका निभाते हुए CBSE अधिकारियों से संपर्क किया। राज्य सरकार ने लगातार संवाद और बातचीत के जरिए यह मांग उठाई कि खासी और गारो जैसी प्रमुख स्थानीय भाषाओं को राष्ट्रीय स्तर के शैक्षिक ढांचे में उचित मान्यता दी जानी चाहिए।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, मेघालय की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि राज्य की बड़ी आबादी इन भाषाओं का उपयोग दैनिक जीवन में करती है और इन्हें शिक्षा प्रणाली में शामिल करना छात्रों के लिए सांस्कृतिक और शैक्षणिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
CBSE के इस संशोधित कदम को NEP 2020 की उस नीति के अनुरूप माना जा रहा है, जिसमें क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने और मातृभाषा आधारित शिक्षा को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय न केवल भाषाई विविधता को बढ़ावा देगा, बल्कि छात्रों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने में भी मदद करेगा।
मेघालय में इस फैसले का व्यापक रूप से स्वागत किया जा रहा है। शिक्षाविदों और भाषा विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम राज्य की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली में मजबूत स्थान दिलाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है।
स्थानीय शिक्षकों के अनुसार, खासी और गारो भाषाओं को स्कूल स्तर पर पढ़ाए जाने से छात्रों को अपनी भाषा के प्रति गर्व की भावना विकसित होगी और साथ ही भाषाई संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। इससे आने वाले समय में इन भाषाओं में शैक्षणिक सामग्री और साहित्यिक विकास को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।
मेघालय सरकार ने इस निर्णय को अपनी लंबे समय से की जा रही मांग की सफलता के रूप में देखा है। सरकार का कहना है कि यह कदम राज्य और केंद्र के बीच समन्वय और संवाद का सकारात्मक उदाहरण है।
हालांकि, शिक्षा विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अब चुनौती इन भाषाओं के लिए पर्याप्त शिक्षकों, पाठ्यक्रम सामग्री और प्रशिक्षण संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना होगी, ताकि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।
CBSE के इस फैसले के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को भी आने वाले समय में इसी तरह राष्ट्रीय शिक्षा ढांचे में स्थान मिल सकता है, जिससे भारत की भाषाई विविधता को और मजबूती मिलेगी।
कुल मिलाकर, खासी और गारो भाषाओं का CBSE सिलेबस में शामिल होना न केवल मेघालय के लिए बल्कि पूरे देश की शिक्षा नीति के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो स्थानीय भाषाओं के संरक्षण और शिक्षा के क्षेत्र में समावेशिता को बढ़ावा देता है।





