मेघालय
मेघालय में बाल सुरक्षा की पहल, पूर्वी खासी हिल्स से प्रोजेक्ट शुरू
Tara Tandi
16 Oct 2026 7:31 PM IST

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मेघालय: मावलाई ब्लॉक में POCSO (पॉक्सो) के 29 मामलों और मावरिंगक्नेन्ग ब्लॉक में 26 मामलों की रिपोर्ट सामने आने के बाद, मेघालय राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (MSLSA) और पूर्वी खासी हिल्स के जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) ने बच्चों की सुरक्षा के लिए एक पहल शुरू की है।
'का जिंगकिरमेन' (आशा) नाम की इस परियोजना को शुक्रवार को मेघालय सरकार के सहयोग से शुरू किया गया। इसका उद्देश्य बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकना, कानूनी अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाना और 'यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण' (POCSO) अधिनियम, 2012 के तहत सामुदायिक स्तर पर बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है।
मेघालय उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रेवती मोहिते डेरे, जो MSLSA की संरक्षक-प्रमुख (Patron-in-Chief) भी हैं, ने बताया कि यह पहल न्यायिक कार्यवाही के दौरान सामने आए मामलों को देखते हुए शुरू की गई है। इनमें वे मामले भी शामिल हैं, जिनमें किशोर किसी प्रेम संबंध में शामिल थे।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि युवाओं को यह समझना चाहिए कि नाबालिगों के साथ यौन गतिविधियों के क्या कानूनी परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि POCSO अधिनियम के तहत, 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति की सहमति को बचाव के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों के गंभीर और दूरगामी परिणाम हो सकते हैं—जैसे स्कूल छोड़ना, गर्भावस्था, गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई। इससे लड़कों और लड़कियों, दोनों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।
शिक्षा के महत्व पर जोर देते हुए, मुख्य न्यायाधीश ने बच्चों से अपनी पढ़ाई पूरी करने और अपने सपनों को पूरा करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सशक्तिकरण और भविष्य के अवसरों तक पहुँचने के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है।
समाज कल्याण विभाग के आयुक्त और सचिव प्रवीण बख्शी ने बताया कि यह परियोजना कानूनी जागरूकता, समुदाय को संवेदनशील बनाने और सरकारी विभागों तथा अन्य हितधारकों के बीच आपसी समन्वय पर केंद्रित होगी।
उन्होंने मावलाई ब्लॉक में सामने आए 29 POCSO मामलों और मावरिंगक्नेन्ग ब्लॉक के 26 मामलों का हवाला देते हुए कहा कि इससे पता चलता है कि लगातार जागरूकता फैलाने और बचाव के उपाय करने की कितनी जरूरत है।
बख्शी ने बच्चों की सुरक्षा के लिए पहले से मौजूद उपायों के बारे में भी बताया। इनमें 'मिशन वात्सल्य' शामिल है, जो कठिन परिस्थितियों में रह रहे बच्चों को देखभाल और सहायता प्रदान करता है। इसके अलावा, 'चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशंस' (बाल देखभाल संस्थान) भी हैं, जो जरूरतमंद बच्चों को आश्रय, सुरक्षा और पुनर्वास की सुविधा देते हैं। उन्होंने बताया कि मदद तक पहुँच को बेहतर बनाने के लिए चाइल्ड हेल्पलाइन को 'इमरजेंसी रिस्पॉन्स सपोर्ट सिस्टम' (112) और 'महिला हेल्पलाइन' (181) के साथ जोड़ दिया गया है।
मेघालय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और MSLSA के कार्यकारी अध्यक्ष, न्यायमूर्ति एच.एस. थांगखिव ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के निर्देशों के तहत यह पहल शुरू की गई है। इसका उद्देश्य जागरूकता बढ़ाना है, खासकर उन बच्चों और समुदायों के बीच जो सबसे अधिक असुरक्षित हैं या अपराधों से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कानूनी जानकारी ऐसी भाषाओं में दी जानी चाहिए जिसे बच्चे और स्थानीय समुदाय आसानी से समझ सकें, ताकि जागरूकता कार्यक्रम अधिक सुलभ और प्रभावी बन सकें।
इस परियोजना में POCSO (पोक्सो) अधिनियम के तहत बच्चों के अधिकार, 'गुड टच' और 'बैड टच', सहमति (कंसेंट), बच्चों की सुरक्षा और डिजिटल जागरूकता (जिसमें ऑनलाइन खतरों और साइबर अपराध से बचाव शामिल है) जैसे विषय शामिल होंगे।
इसके अलावा, बच्चों और आम लोगों को मदद पाने में आसानी हो, इसके लिए विभिन्न हेल्पलाइन नंबरों का प्रचार-प्रसार भी किया जाएगा। इनमें लीगल सर्विसेज हेल्पलाइन (15100), साइबर क्राइम हेल्पलाइन (1930) और पुलिस इमरजेंसी हेल्पलाइन (112) शामिल हैं।
इस पहल में सामाजिक कल्याण, स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग, पुलिस, जिला प्रशासन, छात्र, शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, पैरा-लीगल स्वयंसेवक और पारंपरिक ग्रामीण संस्थाएं शामिल होंगी।
शोषण को रोकने के साथ-साथ, इस परियोजना का लक्ष्य बच्चों को मार्गदर्शन और सहायता सेवाओं से जोड़कर, उनके स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) की दर को कम करना भी है।
इस पहल के माध्यम से, कानूनी सेवा प्राधिकरण और राज्य सरकार का उद्देश्य विभिन्न संस्थाओं और स्थानीय समुदायों के बीच तालमेल को मजबूत करना है। इससे बच्चों की सुरक्षा बेहतर होगी, कानूनी जागरूकता बढ़ेगी, और उन्हें सुरक्षा तथा पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) सेवाएं आसानी से मिल सकेंगी।
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