मणिपुर
आय बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन से निपटने में सेरीकल्चर की भूमिका
Tara Tandi
8 Oct 2026 5:59 PM IST

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मणिपुर: मणिपुर में जलवायु परिवर्तन की वजह से खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों पर बुरा असर पड़ रहा है, ऐसे में रेशम पालन (सेरीकल्चर) आजीविका के एक अच्छे विकल्प के तौर पर उभर रहा है। इससे किसानों को नियमित आय तो मिलती ही है, साथ ही सदाबहार होस्ट-प्लांट (रेशम के कीड़ों के लिए भोजन वाले पौधे) की खेती से हरियाली भी बढ़ती है।
रेशम उत्पादन के लिए अनुकूल जलवायु होने के बावजूद, मणिपुर में रेशम पालन राज्य के कुछ ही इलाकों तक सीमित है। अधिकारियों और किसानों का कहना है कि अगर इस तरीके को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए, तो इससे ग्रामीण आय के स्रोत बढ़ सकते हैं और पर्यावरण को भी फायदा हो सकता है।
मणिपुर की समशीतोष्ण से लेकर उपोष्णकटिबंधीय जलवायु भारत में पैदा होने वाली रेशम की चारों मुख्य किस्मों — शहतूत (मलबेरी), एरी, टसर और मूगा — के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
हालांकि, रेशम पालन खुद भी जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो सकता है। बढ़ता तापमान, अनियमित बारिश, सूखा, नमी में उतार-चढ़ाव और कीटों व बीमारियों का प्रकोप होस्ट-प्लांट और रेशम के कीड़ों के पालन, दोनों पर असर डाल सकता है।
वहीं दूसरी ओर, रेशम पालन में इस्तेमाल होने वाले सदाबहार होस्ट-प्लांट लंबे समय तक हरियाली बनाए रख सकते हैं और बढ़ने के दौरान हवा से कार्बन सोख सकते हैं, जिससे आर्थिक फायदे के साथ-साथ पर्यावरण को भी लाभ मिलता है।
धान की खेती से रेशम पालन की ओर
बिष्णुपुर जिले के कुम्बी टेराखोंग के 56 वर्षीय किसान शोरेनसांगबम देबेन सिंह के लिए, पारंपरिक धान की खेती से रेशम पालन की ओर बढ़ने से उनकी आय और उनके घर के आस-पास का नज़ारा, दोनों बदल गए हैं।
देबेन ने 2010 में अपने घर से लगी ज़मीन पर लगभग 450 शहतूत के पौधे लगाकर शुरुआत की थी। एक साल बाद, उन्होंने छोटे पैमाने पर रेशम के कीड़ों का पालन शुरू किया।
समय के साथ, उन्होंने इस गतिविधि को लगभग दो एकड़ ज़मीन पर फैले एक इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम (एकीकृत खेती प्रणाली) में बदल दिया।
उनकी पत्नी, तोइजम लतारानी ने भी उनके रेशम पालन के काम में अहम भूमिका निभाई है और खेत को विकसित करने के परिवार के प्रयासों में शामिल रही हैं।
देबेन ने कहा, "पहले मैं अपनी ज़मीन पर धान और कुछ सब्ज़ियाँ उगाता था। लेकिन अब मैं पूरी तरह से अपने घर के पास दो एकड़ ज़मीन पर रेशम पालन वाली एकीकृत खेती करने लगा हूँ। मेरे अनुभव के अनुसार, इस खेती के तरीके को अपनाने के बाद मेरी आय दोगुनी हो गई है।"
उन्होंने कहा कि धान की खेती में ज़्यादा खर्च और ज़्यादा मेहनत लगती थी, जबकि शहतूत के पौधे कई सालों तक पैदावार दे सकते हैं। उन्होंने कहा, "धान की खेती में किसान को बार-बार ज़मीन जोतनी पड़ती है और एक बार खेती हो जाने के बाद ज़मीन खाली और बेकार पड़ी रहती है। रेशम कीट पालन (सेरीकल्चर) में शहतूत के पौधे कम से कम 20 से 25 साल तक चलते हैं।"
देबेन शहतूत के पौधों के बीच मौसमी सब्ज़ियाँ भी उगाते हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी होती है और साथ ही मिट्टी की ऊपरी परत और उसकी उपजाऊ क्षमता बनाए रखने में भी मदद मिलती है।
उन्होंने कहा, "एक साल में मैं कोकून और सब्ज़ियाँ बेचकर कम से कम 4 लाख रुपये कमा सकता हूँ। यह धान की खेती से होने वाली मेरी आमदनी का दोगुना है।"
उनके काम की वजह से उन्हें मणिपुर के सफल रेशम कीट पालकों में गिना जाता है और उन्हें सेंट्रल सिल्क बोर्ड, रीजनल सेरीकल्चर रिसर्च स्टेशन और राज्य के सेरीकल्चर विभाग से पुरस्कार और सम्मान भी मिले हैं।
देबेन ने शुरू में अपने पिता से रेशम कीट पालन सीखा था, लेकिन 2011 से उन्हें मणिपुर सरकार के सेरीकल्चर विभाग से तकनीकी और अन्य मदद मिलने लगी।
कई बार फसल, आमदनी के कई ज़रीये
देबेन के अनुसार, सही हालात में साल में चार से पाँच बार रेशम के कीड़े पाले जा सकते हैं। उनके खेत में मार्च और सितंबर का समय सबसे ज़्यादा पैदावार वाला माना जाता है, और इन चक्रों के दौरान औसतन लगभग 120 किलोग्राम कोकून का उत्पादन होता है।
अप्रैल और अक्टूबर में उत्पादन घटकर लगभग 40-50 किलोग्राम रह जाता है, जबकि नवंबर आमतौर पर सबसे कम उत्पादन वाला समय होता है।
उत्पादन बनाए रखने के लिए वे साल में दो बार - जुलाई और दिसंबर में - शहतूत के पौधों की छंटाई करते हैं।
उनके खेत के मिले-जुले स्वरूप की वजह से वे न केवल रेशम के कोकून से, बल्कि शहतूत के पौधों के बीच उगाई गई सब्ज़ियों से भी कमाई कर पाते हैं।
जलवायु परिवर्तन भी रेशम कीट पालन के लिए एक चुनौती है
रेशम कीट पालन के पर्यावरणीय फ़ायदों का मतलब यह नहीं है कि यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के असर से अछूता है।
देबेन ने कहा कि रेशम के कीड़े पर्यावरणीय स्थितियों के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं और तापमान बढ़ने तथा नमी में बदलाव के कारण उन्हें पालना और मुश्किल हो गया है।
उन्होंने कहा कि किसानों को पालन-घर के अंदर तापमान और नमी पर लगातार नज़र रखने और कीट व बीमारी के प्रबंधन पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है। मणिपुर सेरीकल्चर विभाग के सुपरिटेंडेंट गुरुआरिबम जोशीकांता शर्मा ने कहा कि राज्य का मौसम रेशम उत्पादन के लिए बहुत अच्छा है और यहाँ रेशम की चारों मुख्य किस्में पैदा की जा सकती हैं।
शर्मा ने कहा, "मणिपुर में समशीतोष्ण से लेकर उपोष्णकटिबंधीय मौसम है और यहाँ रेशम के कीड़ों की चारों किस्मों — मलबरी, ओक टसर, एरी और मूंगा — का सफलतापूर्वक पालन किया जा सकता है।"
उन्होंने कहा कि हालांकि रेशम उत्पादन मणिपुर की संस्कृति और पारंपरिक कुटीर उद्योगों से गहराई से जुड़ा है, लेकिन यह सेक्टर अभी भी काफी छोटा है और मुख्य रूप से घाटी वाले इलाकों तक ही सीमित है।
मणिपुर में रेशम उत्पादन में भारी गिरावट
सेरीकल्चर विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि
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