मणिपुर

कुकी-नागा संघर्ष में नया मोड़, जमीन और अवैध कारोबार के रास्तों पर विवाद

nidhi
12 Oct 2026 2:23 PM IST
कुकी-नागा संघर्ष में नया मोड़, जमीन और अवैध कारोबार के रास्तों पर विवाद
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इंफाल: मणिपुर में कुकी और नागा समुदायों के बीच बढ़ती हिंसा ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। वर्ष 2023 में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच शुरू हुए जातीय संघर्ष के बाद अब पहाड़ी इलाकों में कुकी-नागा टकराव गंभीर रूप ले चुका है। इस संघर्ष के पीछे केवल जातीय पहचान का विवाद नहीं, बल्कि जमीन पर अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सड़क मार्गों का नियंत्रण और अवैध कारोबार से जुड़े आर्थिक हित भी चर्चा के केंद्र में हैं।
अक्टूबर 2026 में हिंसा की नई घटनाओं के बाद उखरुल, कामजोंग और कांगपोकपी जिलों में तनाव बढ़ गया है। हालिया झड़पों में नौ लोगों की मौत की खबर सामने आई है। मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह ने शांति बनाए रखने की अपील करते हुए अधिकारियों को स्थिति नियंत्रित करने के निर्देश दिए हैं।
फरवरी से बढ़ा कुकी-नागा संघर्ष
मणिपुर में फरवरी 2026 से कुकी और नागा समुदायों के बीच हिंसक घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। शुरुआती टकराव उखरुल जिले के लितान सारेइखोंग इलाके में हुआ था। स्थानीय विवाद के बाद पत्थरबाजी, आगजनी और गोलीबारी की घटनाएं हुईं। इसके बाद संघर्ष आसपास के इलाकों तक फैल गया। कई गांवों में मकानों को नुकसान पहुंचाया गया और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा। सितंबर के अंत तक दोनों समुदायों के बीच हिंसा में 50 से अधिक लोगों की मौत होने की जानकारी सामने आई थी।
जमीन और सड़क मार्गों पर अधिकार का विवाद
इस संघर्ष का एक महत्वपूर्ण पहलू पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन और संपर्क मार्गों को लेकर अलग-अलग समुदायों के दावे हैं।
कांगपोकपी और चुराचांदपुर को जोड़ने वाले टाइगर-जर्मन रोड को लेकर भी विवाद सामने आया था। कुकी-जो संगठनों के लिए यह मार्ग महत्वपूर्ण संपर्क सुविधा है, क्योंकि 2023 के संघर्ष के बाद इंफाल घाटी से होकर आवाजाही कठिन हुई है।
दूसरी ओर, कुछ नागा संगठनों ने आरोप लगाया कि सड़क का हिस्सा उनकी पारंपरिक जमीन से होकर गुजरता है। इस कारण स्थानीय विवाद ने व्यापक सामुदायिक तनाव का रूप ले लिया।
अवैध ड्रग्स कारोबार और मुनाफे का सवाल
मणिपुर की हिंसा के आर्थिक पहलू को लेकर सुरक्षा अधिकारियों ने गंभीर आशंकाएं जताई हैं। राज्य की सीमा म्यांमार से लगती है, जहां से होकर वैध और अवैध व्यापार के विभिन्न रास्ते गुजरते हैं।
पहले मोरेह क्षेत्र को सीमापार व्यापार का प्रमुख केंद्र माना जाता था। लेकिन 2023 के जातीय संघर्ष के बाद पारंपरिक कारोबारी रास्ते प्रभावित हुए। इसके बाद कामजोंग जैसे क्षेत्रों से नए मार्गों के इस्तेमाल की बात सामने आई है।
सुरक्षा अधिकारियों के आकलन के अनुसार, कुछ सशस्त्र समूहों के बीच इन रास्तों, अवैध व्यापार और उससे होने वाली कमाई पर नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा हिंसा को बढ़ावा दे सकती है। हालांकि, यह जांच और सुरक्षा आकलन का विषय है। हर हिंसक घटना को ड्रग्स कारोबार से जोड़ने का प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
अवैध वसूली से किसे होता है फायदा?
संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में सशस्त्र समूहों द्वारा व्यापारियों और परिवहन गतिविधियों से वसूली किए जाने की समस्या पर भी शोध हुए हैं।
संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, मणिपुर और म्यांमार के सीमावर्ती व्यापारिक रास्तों पर सशस्त्र समूहों की वसूली व्यवस्था में संघर्ष के बाद बदलाव आया है। इससे छोटे व्यापारियों की लागत बढ़ी है, जबकि अधिक संसाधन वाले कारोबारी नेटवर्क मजबूत हो सकते हैं।
यह अध्ययन बताता है कि हिंसा का आर्थिक प्रभाव केवल कारोबार बंद होने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापार पर नियंत्रण रखने वाले समूहों के बीच शक्ति संतुलन भी बदल सकता है।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर भी खींचतान
कुकी-नागा तनाव का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू अलग-अलग समुदायों की क्षेत्रीय आकांक्षाओं से जुड़ा है। नागा संगठनों की लंबे समय से अपने पारंपरिक क्षेत्रों को लेकर राजनीतिक मांगें रही हैं। वहीं 2023 की हिंसा के बाद कुकी-जो संगठनों ने अलग प्रशासनिक व्यवस्था की मांग को प्रमुखता दी है। इन मांगों के बीच जमीन, प्रशासनिक अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर मतभेद बढ़े हैं। जनगणना और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के मुद्दे पर भी अलग-अलग समुदायों के दृष्टिकोण में अंतर है। कुछ नागा और मैतेई संगठन जनगणना से पहले नागरिकता सत्यापन की मांग कर रहे हैं, जबकि कुकी-जो संगठनों ने इस प्रक्रिया के संभावित बहिष्करणकारी प्रभावों पर चिंता जताई है।
अफीम की खेती को लेकर भी विवाद
मणिपुर में अवैध अफीम की खेती लंबे समय से सुरक्षा और राजनीतिक बहस का विषय रही है। हालांकि, उपलब्ध सरकारी आंकड़े बताते हैं कि यह समस्या किसी एक समुदाय या जिले तक सीमित नहीं है। जनवरी और फरवरी 2026 के दौरान सात जिलों में कुल 957 हेक्टेयर क्षेत्र में अफीम की खेती नष्ट की गई थी। इनमें सबसे अधिक 634 हेक्टेयर क्षेत्र उखरुल जिले में था। कांगपोकपी में 98 हेक्टेयर और चुराचांदपुर में 94 हेक्टेयर क्षेत्र में कार्रवाई हुई थी। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि अवैध खेती को किसी एक जातीय समुदाय से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
हिंसा का सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों को
लगातार हिंसा के कारण स्थानीय लोगों के सामने सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा और आवागमन से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं। कई इलाकों में घर जलाए जाने, रास्ते बंद होने और लोगों के विस्थापित होने की घटनाएं सामने आई हैं। अक्टूबर की ताजा घटनाओं के बाद सुरक्षा बलों ने प्रभावित जिलों में गश्त और तलाशी अभियान तेज किए हैं। प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में प्रतिबंधात्मक आदेश भी लागू किए हैं। मणिपुर का मौजूदा संकट दर्शाता है कि जातीय अविश्वास, जमीन के विवाद, राजनीतिक मांगें और अवैध कारोबार से जुड़े हित एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं। स्थायी शांति के लिए हिंसा रोकने के साथ निष्पक्ष जांच, नागरिकों की सुरक्षा, सशस्त्र समूहों पर नियंत्रण और समुदायों के बीच संवाद आवश्यक होगा।
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