मणिपुर

Manipur Pony Crisis: चोरी और घटती संख्या से मणिपुरी टट्टू के अस्तित्व पर खतरा

nidhi
5 Aug 2026 7:56 AM IST
Manipur Pony Crisis: चोरी और घटती संख्या से मणिपुरी टट्टू के अस्तित्व पर खतरा
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मणिपुरी टट्टू पर मंडराया संकट
Imphal: मणिपुर की पहचान से जुड़े दुर्लभ मणिपुरी टट्टू (Manipuri Pony) के अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है। कभी राज्य की संस्कृति, खेल और परंपरा का अहम हिस्सा रहे इस स्वदेशी नस्ल के टट्टू अब घटती संख्या, संरक्षण की कमी और चोरी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह अनमोल नस्ल धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार पर पहुंच सकती है।
मणिपुरी टट्टू का ऐतिहासिक महत्व
मणिपुरी टट्टू सदियों से राज्य की संस्कृति का हिस्सा रहा है। इसे खास तौर पर पारंपरिक सगोल कांगजई (मणिपुरी पोलो) से जोड़ा जाता है। अपनी फुर्ती, सहनशक्ति और छोटे आकार के कारण यह टट्टू दुनिया की खास घोड़ा नस्लों में गिना जाता है।
मणिपुर की पहचान और विरासत में इस टट्टू का विशेष स्थान रहा है।
संख्या में लगातार हो रही कमी
एक समय बड़ी संख्या में पाए जाने वाले मणिपुरी टट्टुओं की संख्या पिछले कुछ दशकों में काफी कम हुई है। इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं—
प्राकृतिक चरागाहों में कमी
आधुनिक परिवहन साधनों का बढ़ता उपयोग
प्रजनन कार्यक्रमों की कमी
देखभाल और संरक्षण में चुनौतियां
चोरी और अवैध बिक्री
चोरी बनी बड़ी चिंता
मणिपुरी टट्टुओं की चोरी ने संरक्षण से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ा दी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि दुर्लभ नस्ल होने के कारण कुछ लोग इन्हें दूसरे स्थानों पर बेचने या अवैध व्यापार करने की कोशिश करते हैं।
चोरी की घटनाओं से न केवल पशुपालकों को आर्थिक नुकसान होता है, बल्कि नस्ल संरक्षण के प्रयासों को भी झटका लगता है।
संरक्षण के लिए उठाए जा रहे कदम
मणिपुरी टट्टू को बचाने के लिए सरकार और विभिन्न संगठनों की ओर से संरक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इनमें शामिल हैं—
नस्ल सुधार और प्रजनन कार्यक्रम
टट्टुओं के लिए सुरक्षित स्थानों का विकास
जागरूकता अभियान
पारंपरिक खेलों को बढ़ावा देना
पशु स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार
पोलो और संस्कृति से जुड़ा भविष्य
मणिपुरी टट्टू केवल एक पशु नस्ल नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक विरासत है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके संरक्षण के लिए स्थानीय समुदायों, सरकार और पशु विशेषज्ञों को मिलकर काम करना होगा।
यदि संरक्षण के प्रयास सफल होते हैं, तो यह दुर्लभ नस्ल आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकती है।
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