मणिपुर

मणिपुर: जंगल-जलस्रोत बचाने को डिप्टी सीएम की अपील

Tara Tandi
17 Oct 2026 7:02 PM IST
मणिपुर: जंगल-जलस्रोत बचाने को डिप्टी सीएम की अपील
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मणिपुर: उप मुख्यमंत्री लोसी डिखो ने जोर देकर कहा है कि जमीन के विवादों और राजनीतिक आकांक्षाओं से कहीं ज्यादा जरूरी जल स्रोतों और जंगलों की सुरक्षा है। उन्होंने चेतावनी दी कि जंगलों के नष्ट होने की वजह से राज्य भर में प्राकृतिक झरने सूख रहे हैं।
डिखो ने इम्फाल में 'क्लाइमेट-रेसिलिएंट स्प्रिंगशेड: रिसर्च, प्रैक्टिस एंड पॉलिसी' (जलवायु-अनुकूल झरना-क्षेत्र: शोध, व्यवहार और नीति) पर आयोजित दूसरे सम्मेलन में यह बात कही। इस सम्मेलन का आयोजन पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन निदेशालय ने किया था। इसका मकसद शोधकर्ताओं, योजनाकारों, विशेषज्ञों, सरकारी विभागों और स्थानीय समुदायों के प्रतिनिधियों को एक साथ लाना था, ताकि भारतीय हिमालयी क्षेत्र में जलवायु-अनुकूल झरना-क्षेत्र प्रबंधन की रणनीतियों पर चर्चा की जा सके।
मणिपुर में चल रहे संघर्ष की ओर परोक्ष रूप से इशारा करते हुए डिखो ने कहा कि भले ही लोग जमीन और राजनीतिक आकांक्षाओं को लेकर लड़ते रहें, लेकिन जल स्रोतों की सुरक्षा हमेशा प्राथमिकता होनी चाहिए।
उन्होंने कहा, "कई वन क्षेत्र नष्ट हो गए हैं, जिसके कारण मणिपुर में प्राकृतिक झरने खत्म हो रहे हैं। हम गोलियां तो खरीद सकते हैं, लेकिन अगर जल स्रोत पूरी तरह सूख जाएं, तो हम पानी नहीं खरीद सकते। हमें जंगलों और झरनों के संरक्षण पर ज्यादा जोर देना चाहिए।"
डिखो ने पानी के महत्व को रेखांकित किया—यह जीवन के लिए जरूरी संसाधन है, कृषि अर्थव्यवस्था का आधार है और हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक अहम हिस्सा है। उन्होंने मणिपुर की पहाड़ियों, जंगलों, आर्द्रभूमियों (वेटलैंड्स), नदियों और घाटियों के बीच मौजूद पारिस्थितिक (इकोलॉजिकल) निर्भरता पर भी प्रकाश डाला और कहा कि निरंतर संरक्षण प्रयासों के जरिए जल स्रोतों को बचाना बहुत जरूरी है।
इस सम्मेलन में सिक्किम, मेघालय और असम सहित कई हिमालयी राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इसके अलावा, नेपाल स्थित 'इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट' (ICIMOD) और 'एडवांस्ड सेंटर फॉर वॉटर रिसोर्सेज डेवलपमेंट एंड मैनेजमेंट' (ACWADAM) के अधिकारी भी इसमें मौजूद थे।
सभा को संबोधित करते हुए, वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग के प्रधान सचिव अरुण कुमार सिन्हा ने बताया कि मणिपुर सरकार ने 2025 में 'स्प्रिंग्स ऑफ मणिपुर' (मणिपुर के झरने) का पहला संस्करण प्रकाशित किया था।
उन्होंने बताया कि इस प्रकाशन में राज्य के विभिन्न जिलों में मौजूद झरनों की सूची, महत्वपूर्ण झरनों की मैपिंग और उनसे जुड़े हाइड्रोजियोलॉजिकल (भू-जल विज्ञान संबंधी) अध्ययन शामिल हैं।
सिन्हा ने कहा कि झरना-क्षेत्र प्रबंधन को केवल अलग-थलग संरक्षण गतिविधियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे राज्य की जल सुरक्षा, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और जलवायु अनुकूलन रणनीतियों का एक अभिन्न हिस्सा बनना चाहिए। उन्होंने वैज्ञानिक साक्ष्य आधार को मजबूत करने को एक प्रमुख प्राथमिकता बताया, जिसमें संवेदनशील क्षेत्रों में झरनों की व्यवस्थित सूची तैयार करना भी शामिल है। उन्होंने कहा कि इस तरह के आकलन में मौसमी बदलावों, पानी के बहाव के पैटर्न, पानी की गुणवत्ता, झरनों पर निर्भर आबादी और मानवीय गतिविधियों के प्रति उनकी संवेदनशीलता का दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए।
सिन्हा ने मणिपुर के लिए एक एकीकृत 'स्प्रिंगशेड' (झरना-क्षेत्र) प्रबंधन ढांचा विकसित करने का भी सुझाव दिया। यह ढांचा महत्वपूर्ण स्प्रिंगशेड की पहचान करने और संरक्षण तथा बहाली के प्रयासों के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन योजनाएं तैयार करने हेतु सामान्य सिद्धांत स्थापित करेगा।
सम्मेलन में हुई चर्चाओं का मुख्य जोर इस बात पर था कि भारतीय हिमालयी क्षेत्र में झरनों की सुरक्षा करने और जल सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, नीति-निर्माण और सामुदायिक भागीदारी को एक साथ लाने की आवश्यकता है।
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