मणिपुर

कुकी शरणार्थी मामले में गड़बड़ी! MMTU ने उठाई जांच की मांग

Tara Tandi
8 Oct 2026 3:40 PM IST
कुकी शरणार्थी मामले में गड़बड़ी! MMTU ने उठाई जांच की मांग
x
इम्फाल: मीतेई (मेइतेई) ट्राइब यूनियन (MMTU) ने आरोप लगाया है कि 1960 के दशक के आखिर में बर्मा (अब म्यांमार) से मणिपुर आए कुकी शरणार्थियों के पुनर्वास में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई। उनका दावा है कि सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर की गई और धोखाधड़ी से सरकारी लाभ हासिल किए गए।
इन आरोपों का ब्योरा MMTU की एक जांच रिपोर्ट में दिया गया है। 7 अक्टूबर को मणिपुर प्रेस क्लब में बोलते हुए, MMTU के रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेल के चेयरमैन और मणिपुर यूनिवर्सिटी के पूर्व कार्यवाहक वाइस-चांसलर प्रो. के. जुगिंद्रो ने कहा कि यह कथित घुसपैठ 25 अक्टूबर 1967 और 18 फरवरी 1968 के बीच हुई थी, जब मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू था।
रिपोर्ट के अनुसार, MMTU का आरोप है कि चीफ कमिश्नर बालेश्वर प्रसाद के प्रशासन के दौरान प्रभावशाली कुकी लोगों और अधिकारियों ने इस स्थिति का फायदा उठाया।
संगठन ने यह भी दावा किया कि राष्ट्रपति शासन लागू होने के कुछ ही समय बाद, लगभग 300 कुकी सरदारों ने इम्फाल में अशांति फैलाई और मणिपुर गजट में प्रकाशित 'मणिपुर हिल एरियाज़ (एक्विजिशन ऑफ़ चीफ्स राइट्स) एक्ट, 1967' की छपी हुई प्रतियों को नष्ट कर दिया।
MMTU का आरोप है कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि वंशानुगत सरदार प्रथा को खत्म करने में बाधा डाली जा सके और पहाड़ी इलाकों में 'मणिपुर लैंड रेवेन्यू एंड लैंड रिफॉर्म्स एक्ट, 1960' को लागू करने में देरी की जा सके। संगठन ने कहा कि उसे हाल ही में नेशनल आर्काइव्स से 1967 के कानून की एक प्रति मिली है और अब वह इसे लागू करने की मांग कर रहा है।
शरणार्थियों के पुनर्वास पर दावे
प्रो. जुगिंद्रो ने कहा कि उस दौरान लगभग 1,500 कुकी परिवार मणिपुर आए थे, जो कथित तौर पर बर्मी सेना से भागकर आए थे।
MMTU की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने शुरू में मार्च 1968 में 500 सत्यापित परिवारों के स्थायी पुनर्वास के लिए 3,62,500 रुपये मंजूर किए थे, जिसमें प्रति परिवार 735 रुपये की सहायता राशि तय की गई थी। खबरों के मुताबिक, पुनर्वास कार्यक्रम को तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर SC वैश ने चुराचांदपुर, तेंगनौपाल, उखरुल और सदर हिल्स में लागू किया था।
MMTU का आरोप है कि बाद में राजनीतिक लॉबिंग के कारण पुनर्वास कार्यक्रम का दायरा बढ़ा दिया गया। 1973 तक, बर्मा कुकी रिफ्यूजी एसोसिएशन ने केंद्र से अतिरिक्त आर्थिक मदद मांगी थी, जिसके बाद 1,509 परिवारों के लिए ज़मीन, अनुसूचित जनजाति का दर्जा और सरकारी लोन जैसी सुविधाएं दी गईं।
संगठन ने यह भी आरोप लगाया कि पुनर्वास के फायदों को बढ़ाने के लिए एक जाली चिट्ठी का इस्तेमाल किया गया था। MMTU के अनुसार, उस दस्तावेज़ में गलत दावा किया गया था कि बर्मा से ज़मीन के रास्ते भारत आने वाले प्रवासियों को 'वापस लौटे लोग' (repatriates) माना जाएगा और वे घर और व्यापार के लिए लोन पाने के हकदार होंगे।
MMTU ने कहा कि यह भारत सरकार के उस समय के नियमों के खिलाफ था, जिनके तहत रंगून में भारतीय दूतावास से जारी पहचान-पत्र के साथ हवाई या समुद्री रास्ते से आने वाले बर्मा से लौटे लोगों को ही मान्यता दी जाती थी। संगठन ने यह भी दावा किया कि तय की गई आवास सहायता सिर्फ़ एक बार मिलने वाली 2,250 रुपये की ग्रांट तक सीमित थी।
संगठन ने बताया कि बाद में पुनर्वास मंत्रालय ने साफ़ किया कि 1967 का दस्तावेज़ फ़र्ज़ी था और बिना दस्तावेज़ों के आने वालों को वैध रूप से वापस लौटे लोग नहीं माना जा सकता।
MMTU ने फायदों की समीक्षा की मांग की
MMTU का आरोप है कि पुनर्वास सहायता पाने की राजनीतिक कोशिशें बाद के सालों में भी जारी रहीं, जिसमें 1982 में की गई लॉबिंग भी शामिल है। संगठन का दावा है कि उसके पास 1967 की उस विवादित चिट्ठी को 1974 में नष्ट करने से जुड़े रिकॉर्ड और लाभार्थियों को दी गई आर्थिक मदद से जुड़े दस्तावेज़ मौजूद हैं।
प्रोफ़ेसर जुगिंद्रो ने यह भी आरोप लगाया कि प्रवासियों के पास रंगून में भारतीय दूतावास से जारी 'फ़ॉरेनर रजिस्ट्रेशन सर्टिफ़िकेट' या 'इमरजेंसी सर्टिफ़िकेट' नहीं थे, और इसलिए उन्होंने उन्हें बाद में जारी नागरिकता और अनुसूचित जनजाति के सर्टिफ़िकेट की वैधता पर सवाल उठाए।
MMTU ने मांग की है कि 1,500 शरणार्थी परिवारों और उनकी अगली पीढ़ियों को कथित तौर पर मिले ST दर्जे की समीक्षा और उसे रद्द किया जाए, गलत तरीके से दी गई ज़मीन और आर्थिक मदद वापस ली जाए, और जो लोग कथित तौर पर गैर-कानूनी तरीके से भारत में आए हैं, उन्हें वापस भेजा जाए। संगठन का कहना है कि मणिपुर में लंबे समय से चली आ रही आबादी और कागज़ात से जुड़ी चिंताओं को दूर करने और नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न्स (NRC) को अपडेट करने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए ये उपाय ज़रूरी थे।
MMTU के आरोपों और ऐतिहासिक दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी। नागरिकता, ज़मीन के मालिकाना हक़ और ST सर्टिफ़िकेट की कानूनी स्थिति की जांच के लिए सरकारी रिकॉर्ड और लागू कानूनों को देखना होगा।
Next Story