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‘हम्प्टी डम्प्टी’ बना चर्चा का विषय
इंफाल: मणिपुर के नोनी जिले के एक स्कूल और बच्चों की मशहूर अंग्रेजी कविता ‘हम्प्टी डम्प्टी’ का जिक्र इन दिनों चर्चा में है। पहली नजर में यह सवाल थोड़ा अजीब लग सकता है कि अंग्रेजी नर्सरी राइम का नोनी के किसी स्कूल से आखिर क्या संबंध है, लेकिन इसके पीछे शिक्षा, भाषा और स्थानीय संस्कृति से जुड़ी एक दिलचस्प बहस छिपी है।
‘Humpty Dumpty sat on a wall…’ दुनिया की सबसे प्रसिद्ध अंग्रेजी नर्सरी राइम्स में से एक है। भारत के ज्यादातर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भी बच्चे इसे शुरुआती कक्षाओं में सीखते हैं। मणिपुर के स्कूल भी इससे अलग नहीं हैं। लेकिन समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि बच्चों को शुरुआती शिक्षा में बाहरी नर्सरी राइम्स के साथ उनकी अपनी स्थानीय भाषा, लोककथाओं और सांस्कृतिक सामग्री को कितनी जगह मिल रही है।
मणिपुर में इस मुद्दे पर पहले भी लेखकों और शिक्षाविदों ने चिंता जताई है। कुछ लोगों का तर्क है कि छोटे बच्चों को केवल ‘हम्प्टी डम्प्टी’ जैसी विदेशी नर्सरी राइम्स रटाने से स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान धीरे-धीरे पाठ्यक्रम से दूर होता जा सकता है। एक स्थानीय टिप्पणी में भी ‘हम्प्टी डम्प्टी’ का उदाहरण देते हुए बच्चों की शिक्षा में मणिपुरी परंपराओं और नैतिक शिक्षाओं की घटती मौजूदगी पर सवाल उठाए गए थे।
नोनी जिला मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में आता है और यहां सरकारी तथा निजी मिलाकर कई स्कूल संचालित हैं। जिला प्रशासन की उपलब्ध जानकारी के अनुसार नोनी में 138 स्कूल दर्ज किए गए थे और इनमें माध्यमिक तथा उच्च माध्यमिक स्तर के कई संस्थान शामिल हैं।
नोनी जिले में चिल्ड्रेन ट्रेनिंग स्कूल, नुंगबा हायर सेकेंडरी स्कूल, किड्स ग्लोरी स्कूल, मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल और शेरोन इंग्लिश हाई स्कूल जैसे संस्थान भी सूचीबद्ध हैं।
ऐसे इलाके में शिक्षा का सवाल केवल किताबों और परीक्षाओं तक सीमित नहीं रहता। नोनी में कई जनजातीय समुदाय रहते हैं, जिनकी अपनी भाषाएं, लोककथाएं, गीत और मौखिक परंपराएं हैं। बच्चों को स्कूल में अंग्रेजी सिखाना जरूरी माना जाता है, लेकिन इसके साथ स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने की चुनौती भी बनी रहती है।
यहीं ‘हम्प्टी डम्प्टी’ प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। यह केवल एक नर्सरी राइम नहीं, बल्कि उस शिक्षा प्रणाली का उदाहरण बन जाता है जिसमें बच्चों को वैश्विक भाषा और सामग्री से परिचित कराया जाता है। सवाल यह है कि क्या इसके साथ स्थानीय कहानियों और गीतों को भी बराबर जगह मिल रही है।
कई शिक्षाविद मातृभाषा में शुरुआती शिक्षा को बच्चों की समझ और सीखने की क्षमता के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं। यदि बच्चा अपने आसपास की चीजों, स्थानीय जानवरों, पौधों, परिवार और संस्कृति से जुड़ी कहानियों के जरिए पढ़ना शुरू करता है, तो उसके लिए विषयों को समझना आसान हो सकता है।
दूसरी ओर अंग्रेजी नर्सरी राइम्स भी भाषा सीखने में उपयोगी हो सकती हैं। छोटे और दोहराव वाले शब्द बच्चों को उच्चारण, शब्दावली और लय समझने में मदद करते हैं। इसलिए बहस अंग्रेजी कविता हटाने की नहीं, बल्कि स्थानीय सामग्री और वैश्विक पाठ्य सामग्री के बीच संतुलन बनाने की है।
नोनी जैसे बहुभाषी जिले में यह संतुलन और भी जरूरी हो जाता है। बच्चों की घरेलू भाषा और स्कूल की भाषा अलग होने पर शुरुआती कक्षाओं में सीखने की कठिनाई बढ़ सकती है। ऐसे में शिक्षक स्थानीय उदाहरणों और मातृभाषा का इस्तेमाल करके बच्चों को अंग्रेजी सहित दूसरी भाषाओं से जोड़ सकते हैं।
मणिपुर सरकार के रिकॉर्ड बताते हैं कि नोनी जिले में सरकारी, निजी और आवासीय प्रकृति के अलग-अलग स्कूल मौजूद हैं। नोनी खullen आश्रम स्कूल जैसे संस्थान जनजातीय समुदाय के बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्थापित किए गए थे।
इसलिए नोनी के स्कूल और ‘हम्प्टी डम्प्टी’ का संबंध किसी रहस्यमय घटना से ज्यादा शिक्षा की बदलती तस्वीर से जुड़ा है। यह सवाल उठाता है कि आधुनिक स्कूलों में बच्चों को दुनिया से जोड़ते समय उनकी अपनी भाषा और सांस्कृतिक विरासत को कैसे बचाया जाए।
अंग्रेजी सीखना आज शिक्षा और रोजगार के लिए अहम माना जाता है, लेकिन स्थानीय पहचान भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ऐसे में विशेषज्ञों के सामने चुनौती यह है कि बच्चे ‘Humpty Dumpty’ भी सीखें और साथ ही अपने समुदाय की कहानियां, गीत और परंपराएं भी जानें।
यही वजह है कि नोनी के स्कूल से जुड़ा ‘हम्प्टी डम्प्टी’ का सवाल एक साधारण नर्सरी राइम से आगे निकलकर शिक्षा, भाषा और सांस्कृतिक पहचान की बड़ी बहस का हिस्सा बन जाता है।
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