मणिपुर

मणिपुर के पहाड़ी जिलों में गांवों की बढ़ती संख्या पर BJP विधायक का दावा

Kavita2
22 Aug 2026 3:10 PM IST
मणिपुर के पहाड़ी जिलों में गांवों की बढ़ती संख्या पर BJP विधायक का दावा
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इंफाल। मणिपुर के पहाड़ी जिलों में गांवों की संख्या को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भाजपा विधायक पाओलिएनलाल हाओकिप ने दावा किया है कि पहाड़ी क्षेत्रों में गांवों की संख्या बढ़ने के पीछे 1990 के दशक में हुए नागा-कुकी जातीय संघर्ष के दौरान बड़े पैमाने पर हुआ विस्थापन और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGS) के तहत कथित तौर पर बनाए गए ‘भूतिया गांव’ प्रमुख कारण हैं।

हाओकिप की यह टिप्पणी राज्य में गैर-मान्यता प्राप्त गांवों की संख्या को लेकर चल रही चर्चा के बीच आई है। इससे पहले मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद कहा था कि सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार राज्य में 926 ऐसे गांव हैं जिन्हें मान्यता नहीं मिली है।

गांवों की संख्या पर उठे सवाल

मणिपुर में गांवों की संख्या और उनकी आधिकारिक मान्यता लंबे समय से प्रशासनिक और राजनीतिक चर्चा का विषय रही है। राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में कई बस्तियों की स्थिति, उनके रिकॉर्ड में दर्ज होने और प्रशासनिक मान्यता को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं।

इसी संदर्भ में भाजपा विधायक पाओलिएनलाल हाओकिप ने पहाड़ी जिलों में गांवों की संख्या में वृद्धि के कारणों पर अपनी बात रखी। उन्होंने इसे केवल प्रशासनिक विस्तार का परिणाम मानने के बजाय ऐतिहासिक विस्थापन और सरकारी योजनाओं से जुड़े कथित अनियमितताओं से जोड़कर देखा।

1990 के दशक के संघर्ष का असर

हाओकिप के मुताबिक, 1990 के दशक में नागा और कुकी समुदायों के बीच हुए जातीय संघर्ष के दौरान बड़ी संख्या में लोग अपने मूल गांवों से विस्थापित हुए। विस्थापन के बाद लोगों ने नए इलाकों में बसावट की, जिससे समय के साथ नई बस्तियों की संख्या बढ़ी।

जातीय संघर्षों के दौरान बड़ी संख्या में लोगों का स्थान बदलना मणिपुर के सामाजिक और भौगोलिक ढांचे पर असर डालने वाली प्रमुख घटनाओं में रहा है। विस्थापित परिवारों ने सुरक्षा और आजीविका की तलाश में नए स्थानों पर बसना शुरू किया। ऐसी कई बस्तियां बाद में स्थायी रूप लेती गईं।

हाओकिप का तर्क है कि वर्तमान में पहाड़ी जिलों में दिखाई देने वाली गांवों की संख्या को समझने के लिए इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना जरूरी है।

MGNREGS से जोड़ा ‘भूतिया गांवों’ का मुद्दा

भाजपा विधायक ने गांवों की संख्या में वृद्धि के लिए MGNREGS से जुड़ी कथित अनियमितताओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि रोजगार योजना के तहत लाभ लेने के उद्देश्य से कुछ जगहों पर ऐसे गांवों का निर्माण या रिकॉर्ड तैयार किया गया, जिनका वास्तविक धरातल पर अस्तित्व नहीं था।

ऐसी बस्तियों को उन्होंने ‘भूतिया गांव’ कहा। हालांकि, इस दावे को लेकर संबंधित सरकारी स्तर पर विस्तृत तथ्य और जांच के निष्कर्ष सामने आना बाकी हैं। इसलिए इस आरोप को फिलहाल राजनीतिक दावा ही माना जा रहा है।

MGNREGS ग्रामीण परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराने वाली केंद्र सरकार की प्रमुख योजना है। योजना के तहत ग्राम पंचायत स्तर पर विभिन्न कार्यों और लाभार्थियों का रिकॉर्ड तैयार किया जाता है। ऐसे में किसी भी फर्जी या काल्पनिक बस्ती के जरिए योजना का लाभ लेने का आरोप प्रशासनिक जांच का विषय बन सकता है।

बीरेन सिंह के बयान के बाद तेज हुई चर्चा

गांवों की संख्या को लेकर चर्चा उस समय और तेज हुई जब पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद राज्य में 926 गैर-मान्यता प्राप्त गांवों का जिक्र किया।

बीरेन सिंह के अनुसार, सरकारी रिकॉर्ड में ऐसे 926 गांव दर्ज हैं जिन्हें अभी तक आधिकारिक मान्यता नहीं मिली है। इस बयान के बाद इन गांवों की स्थिति, उनके भौगोलिक विस्तार और प्रशासनिक रिकॉर्ड को लेकर सवाल उठने लगे।

इसी पृष्ठभूमि में हाओकिप की टिप्पणी सामने आई है। उनके बयान ने गांवों की संख्या बढ़ने के पीछे के कारणों को लेकर बहस को और व्यापक कर दिया है।

मान्यता का मुद्दा संवेदनशील

मणिपुर में गांवों की प्रशासनिक मान्यता केवल रिकॉर्ड से जुड़ा विषय नहीं है। राज्य के पहाड़ी और घाटी क्षेत्रों में भूमि, प्रशासनिक सीमाओं और स्थानीय निकायों से जुड़े मुद्दे राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहे हैं।

किसी बस्ती को आधिकारिक मान्यता मिलने से प्रशासनिक सेवाओं, विकास योजनाओं और सरकारी सुविधाओं तक पहुंच प्रभावित हो सकती है। इसलिए गैर-मान्यता प्राप्त गांवों की संख्या और उनकी स्थिति को लेकर स्पष्ट सरकारी रिकॉर्ड महत्वपूर्ण माना जाता है।

विशेष रूप से मणिपुर में लंबे समय से जारी जातीय तनाव के बीच गांवों और बस्तियों से जुड़े आंकड़ों की सटीकता का महत्व और बढ़ जाता है।

आधिकारिक आंकड़ों की जरूरत

हाओकिप के बयान के बाद अब इस विषय पर विस्तृत और पारदर्शी आंकड़ों की जरूरत महसूस की जा रही है। किन गांवों को मान्यता प्राप्त है, कितने गांव गैर-मान्यता प्राप्त हैं, कौन-सी बस्तियां विस्थापन के बाद अस्तित्व में आईं और किन मामलों में सरकारी योजनाओं के तहत अनियमितता के आरोप हैं—इन सभी पहलुओं को अलग-अलग दर्ज करना जरूरी होगा।

यदि MGNREGS के तहत कथित ‘भूतिया गांवों’ के आरोपों की पुष्टि होती है तो संबंधित मामलों की जांच और जिम्मेदारी तय करने की जरूरत होगी। वहीं, विस्थापन के कारण बनी वास्तविक बस्तियों को प्रशासनिक व्यवस्था में उचित स्थान देने का सवाल भी महत्वपूर्ण रहेगा।

फिलहाल, भाजपा विधायक की टिप्पणी और पूर्व मुख्यमंत्री के बयान ने मणिपुर में गांवों की संख्या और उनकी मान्यता के मुद्दे को फिर से राजनीतिक चर्चा में ला दिया है। अब यह देखना होगा कि राज्य सरकार और संबंधित प्रशासनिक एजेंसियां इन दावों पर क्या तथ्य सामने रखती हैं और 926 गैर-मान्यता प्राप्त गांवों को लेकर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।

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